Pune: तलेगांव में भाजपा की अंदरुनी जंग, रेशमा शिंदे बनाम दीपाली गव्हाणे की दावेदारी से बढ़ा तनाव
Pune: तलेगांव ढमढेरे में भाजपा की टिकट दावेदारी को लेकर रेशमा शिंदे और दीपाली गव्हाणे के बीच मुकाबला तेज हो गया है। गुटबाजी बढ़ने से भाजपा को चुनाव से पहले ही आंतरिक चुनौती का सामना करना होगा।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे न्यूज (सौ. डिजाइन फोटो )
Maharashtra Local Body Election: शिरूर तहसील के तलेगांव ढमढेरे जिला परिषद गुट में भाजपा को राष्ट्रवादी कांग्रेस से लड़ने से पहले घर में ही चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
भाजपा के दो मजबूत दावेदार भाजपा स्नातक आघाडी के जिला अध्यक्ष राहुल गव्हाणे और शिरूर तहसील अध्यक्ष जयेश शिंदे अपनी-अपनी पत्नियों रेशमा शिंदे और दीपाली गव्हाणे के लिए जोर लगा रहे हैं।
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि इन दो शक्तिशाली उम्मीदवारों में से कौन बाजी मारेगा। तलेगांव ढमढेरे जिला परिषद गुट में भाजपा पदवीधर आघाडी के जिलाध्यक्ष राहुल गव्हाणे के मैदान में उतरने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। दूसरी ओर, शिरूर तहसील अध्यक्ष जयेश शिंदे ने अपनी पत्नी रेश्मा शिंदे को मैदान में उतारकर अपनी मजबूत मोर्चाबंदी शुरू कर दी है।
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शिंदे गुट की संगठनात्मक शक्ति और कार्यकर्ताओं पर उनकी मजबूत पकड़ को आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शिंदे को शिरूर तहसील की कमान मिलने से उनके समर्थकों को उम्मीद है।
वहीं, गव्हाणे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के माध्यम से सेवा कार्य किया है, जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है। गुट-गण आरक्षण घोषित होने के बाद तलेगांव के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं, जिससे प्रबल नेताओं को अपनी पत्नी के लिए बहुत प्रयास करने पड़ रहे हैं।
गव्हाणे को मिला राजनीतिक विरासत का लाभ
- राहुल गव्हाणे की पत्नी दीपाली गव्हाणे ने हाल ही में मतदाताओं के लिए उज्जैन यात्रा का आयोजन करके अपना सामाजिक संपर्क बढ़ाया है।
- इस पहल ने मतदाताओं के बीच उत्सुकता पैदा की है. दीपाली गव्हाणे, वडगांव शेरी के विधायक बापूसाहेब पठारे की बेटी हैं और उन्हें राजनीतिक विरासत प्राप्त है।
- चर्चा है कि क्या गव्हाणे दंपति का राजनीतिक प्रभाव उन्हें जीत दिला पाएगा, गव्हाणे ने चुनाव पूर्व माहौल बनाना शुरू कर दिया है, और यह भी चर्चा है कि उन्हें भाजपा से उम्मीदवारी के संकेत मिले हैं।
जयेश शिंदे की ताकत और मजबूत पकड़
इसके विपरीत, जयेश शिंदे के नेतृत्व वाला गुट भी सक्रिय है और उन्हें तहसील के पुराने कार्यकर्ताओं का समर्थन मिल रहा है। शिंदे ने लंबे समय तक पार्टी संगठन में काम किया है और स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ मजबूत संबंध बनाए हैं। वे सरकारी योजनाओं और जिला परिषद गुट में महत्वपूर्ण फंड लाने में सफल रहे हैं। इसलिए, आगामी चुनाव में उम्मीदवार तय करते समय शिंदे के गुट पर विचार करना भाजपा के लए आवश्यक होगा।
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भाजपा की आंतरिक प्रतिस्पर्धा और महाविकास आघाड़ी की भूमिका
भाजपा में फिलहाल गव्हाणे बनाम शिंदे के बीच दो प्रभावी समीकरण खड़े होने से तलेगांव ढमढेरे गुट में राजनीतिक तनाव बढ़ गया है. गव्हाणे दंपति के सामाजिक कार्यक्रमों को मिल रहे प्रतिसाद के बावजूद, शिंदे की गठनात्मक पकड़ निर्णायक साबित हो सकती है। राजनीतिक गलियारों से संकेत मिल हे हैं कि जयेश शिंदे रुकने वाले नहीं हैं और उनका मोर्चा अधिक आक्रामक होने वाला है। भाजपा के भीतर की यह आंतरिक प्रतिस्पर्धा किस मोड़ पर जाकर समाप्त होगी, इस पर पूरे गुट की नजर है। इसी बीच शरद पवार गुट, अजीत पवार गुट और शवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट की भूमिका भी निर्णायक होगी।यदि महाविकास नाघाड़ी की उम्मीदवारी पर फैसला नहीं हो पाता है, तो चौरंगी मुकाबला होने के संकेत चल रहे हैं।
