Pune MNC Election में वंशवाद का मुद्दा गरम, दिग्गज नेताओं के परिजन मैदान में
Maharashtra Local Body Election: पुणे मनपा चुनाव से पहले वंशवाद का मुद्दा गरमा गया है। नेताओं के रिश्तेदारों की टिकट दावेदारी से कार्यकर्ताओं में नाराजगी और बगावत की आशंका बढ़ गई है।
- Written By: अपूर्वा नायक
पुणे महानगरपालिका (सौ. सोशल मीडिया )
Pune News In Hindi: महानगर पालिका (मनपा) चुनावों की रणभेरी बजते ही शहर की राजनीति में ‘वंशवाद’ का मुद्दा गरमा गया है। एक ओर जहां सभी प्रमुख दल ‘इलेक्टिव मेरिट’ और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने का दावा कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर धरातल पर कद्दावर नेताओं के रिश्तेदारों की लंबी कतार ने सामान्य कार्यकर्ताओं में बेचैनी पैदा कर दी है। शहर के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार कम से कम 16 प्रभावशाली नेताओं के बेटे बेटियां और करीबी रिश्तेदार चुनावी समत में उतरने के लिए सक्रिय हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, टिकटों के बंटवारे को लेकर मचे घमासान ने वरिष्ठ नेतृत्व की सिरददा बढ़ा दी है।
प्रमुख ‘हाई-प्रोफाइल’ दावेदार
- विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में इस मुद्दे पर अधिक चर्चा हो रही है, जहां कथित तौर पर 16 में से 12 दावेदार सीधे तौर पर पार्टी की पुरानी पृष्ठभूमि से जुड़े परिवारों से आते हैं।
- चुनाव में जिन चेहरों पर सबकी नजरें टिकी है, उनमें प्रमुख नाम कुणाल तिलक (दिवंगत विधायक मुक्ता तिलक के पुत्र), स्वरदा बापट (दिवंगत सांसद गिरीश बापट की बहू), राघवेंद्र व हर्षवर्धन मानकर (पूर्व उपमहापौर दीपक मानकर के पुत्र), करण मिसाल (विधायक व राज्य मंत्री माधुरी मिसाल के पुत्र), प्रणद धंगेकर (विधायक रविंद्र धंगेकर के पुत्र), हेमंत बागुल (पूर्व उपमहापौर आबा बागुल के पुत्र) के नाम भी चर्चा में है।
- इनके अलावा सुप्रिया कांबले (वर्तमान विधायक सुनील कांबले की पुत्री), सुरेंद्र पठारे (राष्ट्रवादी कांग्रेस शरदचंद्र पवार गुट से विधायक बापू पठारे के पुत्र), और प्रियंका शेडगे (पूर्व उपमहापौर सरस्वती शेडगे की पुत्री) जैसे नाम भी लॉबिंग में जुटे हैं, हेमंत बागुल । पूर्व उपमहापौर आबा बागुल के पुत्र) के नाम भी चर्चा में है।
- साथ ही चेतन टिलेकर, ईशान तुपे, मयूरेश वांजले, महेश पुंडे और गिरिराज सावंत को भी संभावित उम्मीदवारों में गिना जा रहा है।
आम कार्यकर्ता की मेहनत का क्या मूल्य
दशकों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले और दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। अगर केवल नेताओं के बच्चों को ही मौका मिलना है, तो आम कार्यकर्ता की मेहनत का क्या मूल्य रह जाता है?
– एक वरिष्ट कार्यकर्ता का दर्द
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लगे आरोप, ‘मेरिट’ की बातें दिखावा
पार्टियों का आधिकारिक रुख यह है कि टिकट केवल जीतने की क्षमता और सामाजिक संपर्क के आधार पर दिया जाएगा। हालांकि, निष्ठावान कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ‘मेरिट’ की बाते केवल दिखावा है।
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बगावत-अंदरूनी कलह का डर
- बता दें कि 41 प्रभागों की 165 सीटों के लिए हो रही इस खींचतान ने दलों के भीतर ‘गुटीय राजनीत्ति’ को हवा दे दी है। कई प्रभागों में एक ही सीट के लिए कई प्रभावशाली दावेदार होने के कारण मुंबई और दिल्ली तक लॉचिंग तेज हो गई है।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि वंशवाद को जरूरत से ज्यादा तरजीह दी गई, तो कई वाडों में स्वतंत्र उम्मीदवारों के रूप में बगावत देखने को मिल सकती है, जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ेगा। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान में, पुणे मनपा की सत्ता पर काबिज होने के लिए महायुति और महाविकास अघाड़ी के बीच कांटे की टक्कर है। ऐसे में ‘वंशवाद’ का यह जिन्न किस पार्टी को फायदा पहुंचाएगा और किसे नुकसान, यह तो उम्मीदवारों की अंतिम सूची आने के बाद ही साफ होगा।
