पिंपरी-चिंचवड़ में स्मार्ट सिटी मिशन (सो. एआई)
Pimpri Chinchwad Infrastructure Project News: पिंपरी-चिंचवड़ में ‘स्मार्ट सिटी’ योजना के तहत जिस आधुनिक और सुविधासंपन्न शहर का सपना दिखाया गया था, वह अब अधूरी परियोजनाओं और वित्तीय बोझ के रूप में सामने आ रहा है। वर्ष 2015 में शुरू हुई इस योजना के अंतर्गत शहर को तकनीकी रूप से उन्नत बनाने का लक्ष्य रखा गया था। तीसरे चरण में चयनित होने के बाद ‘पिंपरी-चिंचवड़ स्मार्ट सिटी कंपनी’ का गठन किया गया और बड़े पैमाने पर विकास कार्यों की घोषणा हुई। लेकिन आठ वर्षों में लगभग 1400 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद अधिकांश परियोजनाएं या तो अधूरी हैं या अपेक्षित गुणवत्ता तक नहीं पहुंच सकी हैं।
केंद्र सरकार ने जून 2023 में इस योजना को समाप्त करने के निर्देश दिए थे और स्थानीय प्रशासन ने 31 मार्च 2025 तक इसे बंद करने की समय-सीमा तय की थी। इसके बावजूद कंपनी का कामकाज अब भी जारी है। यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। जानकारों के अनुसार, यह देरी केवल प्रशासनिक अक्षमता का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हैं। स्मार्ट सिटी कंपनी के निदेशक पद से मिलने वाले अधिकार और प्रभाव के चलते कई पदाधिकारी इसे छोड़ना नहीं चाहते, जिससे कंपनी को महानगर पालिका में विलय करने की प्रक्रिया लगातार टल रही है।
पिंपरी-चिंचवड़ स्मार्ट सिटी योजना के तहत सौर ऊर्जा, स्मार्ट किऑस्क, रिवर डेवलपमेंट, साइकिल ट्रैक, पब्लिक वाई-फाई और स्टार्टअप इनोवेशन सेंटर जैसे कई प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे। इसके अलावा कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, स्मार्ट पार्किंग और ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम जैसी तकनीकी योजनाओं पर भी भारी खर्च किया गया। लेकिन जमीनी स्तर पर इनमें से कई योजनाएं अधूरी हैं या उनका उपयोग सीमित है। ठेकेदारों द्वारा समय पर काम पूरा न करने के बावजूद ठोस कार्रवाई न होना भी प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाता है।
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर पिंपरी-चिंचवड़ शहर के वित्तीय ढांचे पर पड़ रहा है। स्मार्ट सिटी कंपनी के संचालन, अधिकारियों के वेतन और अन्य प्रशासनिक खर्चों के कारण मनपा पर हर साल लगभग 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। यह तब है, जब शहर की अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए अक्सर धन की कमी का हवाला दिया जाता है। अब कंपनी को बंद करने और परियोजनाओं के हस्तांतरण के लिए नए सलाहकारों की नियुक्ति की जरूरत भी खर्च को और बढ़ाएगी।
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प्रशासनिक स्तर पर लगातार हो रहे बदलावों ने भी इस समस्या को जटिल बनाया है। आयुक्त स्तर पर बदलाव और राजनीतिक दबाव के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। चुनावी माहौल ने भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने की गति को धीमा कर दिया है, जिससे परियोजनाओं का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।