विशाल रेडियो गैलेक्सी J1007+3540 की लो-फ्रीक्वेंसी रेडियो इमेज (सोर्स: सोशल मीडिया)
Indian Scientists discover Giant Radio Galaxy: खगोल विज्ञान की दुनिया में भारत ने एक बार फिर अपना परचम लहराया है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने अंतरिक्ष की गहराइयों में एक ऐसी दुर्लभघटना का पता लगाया है, जिसने विज्ञान जगत को हैरान कर दिया है। वैज्ञानिकों ने ‘जे1007+3540’ नामक एक ‘महाकाय’ रेडियो आकाशगंगा (जॉयंट रेडियो गैलेक्सी) की खोज की है, जिसके केंद्र में स्थित सुपरमैसिव ब्लैक होल लगभग 10 करोड़ वर्षों की लंबी नींद के बाद दोबारा सक्रिय हो उठा है।
इस ऐतिहासिक शोध का नेतृत्व पुणे स्थित खगोल वैज्ञानिक डॉ. सब्यसाची पाल और पीएचडी शोधार्थी शोभा कुमारी ने किया है। इस शोध में भारत और पोलैंड के वैज्ञानिकों का भी अहम योगदान रहा है। भारत से डॉ. सुरजीत पॉल और पोलैंड से डॉ. मारेक जामरोजी ने इस अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जे 1007+3540 कोई सामान्य आकाशगंगा नहीं है, बल्कि यह आकार के मामले में कल्पना से परे है। यह विशालकाय संरचना लगभग 30 लाख प्रकाश-वर्ष के क्षेत्र में फैली हुई है। इसकी विशालता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह हमारी अपनी मिल्की वे (आकाशगंगा) से करीब 50 गुना बड़ी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इतनी विशाल आकाशगंगा के भीतर किसी ब्लैक होल का दोबारा जीवित होना अत्यंत दुर्लभ घटना है।
यह खोज ब्रह्मांड के क्रमिक विकास और ब्लैक होल की कार्यप्रणाली को समझने की दिशा में एक नया अध्याय खोलती है। इस शोध की सफलता के पीछे भारत की अत्याधुनिक तकनीक का बड़ा हाथ है। वैज्ञानिकों ने पुणे के पास स्थित UGMRT’ के साथ-साथ दुनिया की अन्य शक्तिशाली दूरबीनों का सहारा लिया। विशेष रूप से uGMRT की बैंड-3 फ्रीक्वेंसी ने इस आकाशगंगा की ऐसी परतें खोलीं, जो अब तक छिपी हुई थीं। इन तस्वीरों के जरिए वैज्ञानिकों को आकाशगंगा से निकलने वाले रेडियो उत्सर्जन, उसके पुराने जेट्स और हाल ही में पैदा हुए नए आंतरिक जेट्स की संरचना को स्पष्ट रूप से देखने में मदद मिली।
अध्ययन के दौरान एक अद्भुत ‘डबल-डबल’ संरचना का पता चला है। इसका अर्थ यह है कि ब्लैक होल से निकलने वाले पुराने और धुंधले हो चुके जेट्स के बीच में से नए और अत्यंत शक्तिशाली जेंट्स निकल रहे हैं। यह इस बात का ठोस प्रमाण है कि ब्लैक होल का पुनर्जन्म हो चुका है। चूंकि यह आकाशगंगा एक धने ‘गैलेक्सी क्लस्टर’ के केंद्र में स्थित है, इसलिए वहां मौजूद अत्यधिक गर्म गैसों का दबाव इन नए जेट्स को मोड़ देता है, जिससे वे अंतरिक्ष में आकर्षक वक्राकार आकृतियां बनाते है। इसके अलावा, इस आकाशगंगा के पीछे लाखों वर्षों पुराने अवशेषों से बनी एक लंबी और धुंधली पूंछ देखी गई है, जिसे वैज्ञानिक ‘गैलेक्टिक वैक’ कहते हैं।
यह भी पढ़ें:- Bullet Train Project: पालघर की पहाड़ियों में बुलेट ट्रेन का काम तेज, एक महीने में दूसरा माउंटेन टनल ब्रेकथ्रू
डॉ. सब्यसाची पाल के अनुसार, यह आकाशगंगा केवल विकसित नहीं हो रहीं, बल्कि बाहरी ब्रहमांडीय दबाव के बीच अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। इसे एक ‘हाई-प्रेशर कॉस्मिक लैबोरेटरी’ के रूप में देखा जा रहा है। भारत और पोलैंड के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया गया यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘मंथली नोटिसेस ऑफ दी रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी’ (एमएनआरएएस) में प्रकाशित हुआ है, जो वैश्विक स्तर पर भारत की वैज्ञानिक क्षमता को रेखांकित करता है।
– नवभारत लाइव के लिए पुणे से शैलेंद्र सिंह की रिपोर्ट