सियासत का ‘दादा’ मौन: फडणवीस के साथ शपथ से लेकर चुनाव चिह्न की जंग तक, पढ़िए चाचा-भतीजे से जुड़े फेमस किस्से
Ajit Pawar Death: डिप्टी सीएम अजित पवार का बारामती में विमान हादसे में निधन हो गया है। उनके जाने के बाद अब शरद पवार के साथ उनके रिश्तों, बगावत और 2004 के उस अनसुने सियासी किस्से की चर्चा हर तरफ है।
- Written By: प्रतीक पाण्डेय
अजित पवार और शरद पवार, फोटो- सोशल मीडिया
Ajit Pawar Political Stories: महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बेबाक चेहरे, अजित पवार का सफर बुधवार सुबह बारामती की धरती पर एक दुखद हादसे के साथ थम गया। उनके निधन के साथ ही राज्य की सत्ता के गलियारों में चलने वाले वो तमाम किस्से अब इतिहास बन गए हैं, जिन्होंने सालों तक ‘पवार परिवार’ और एनसीपी की दिशा तय की थी।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दिग्गज नेता और उपमुख्यमंत्री अजित पवार बुधवार सुबह एक बड़े हादसे का शिकार हो गए। वे बारामती में जिला परिषद चुनाव के प्रचार के लिए निकले थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह करीब 8:45 बजे लैंडिंग के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में कुल 6 लोग सवार थे। गंभीर रूप से घायल होने के बाद अजित पवार ने दम तोड़ दिया, जिससे महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
किस्सा 2004 का: जब पहली बार कड़वी हुई थी ‘पवार राजनीति’
अजित पवार के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित किस्सा साल 2004 का है। उस समय विधानसभा चुनाव में NCP को 71 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस को केवल 69। कायदे से मुख्यमंत्री पद NCP का होना चाहिए था, लेकिन शरद पवार ने एक रणनीतिक दांव चलते हुए कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दे दिया।
सूत्रों के अनुसार, अजित पवार अपने चाचा के इस फैसले से बेहद नाराज हुए थे। अजित के समर्थकों का मानना था कि यह सब उन्हें दरकिनार करने और उन्हें मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिए किया गया था। यही वह समय था जब पहली बार ‘चाचा-भतीजे’ के बीच मतभेदों की खबरें सार्वजनिक हुई थीं।
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सुप्रिया सुले की एंट्री और ‘फादर फिगर’ का बदलता दौर
लंबे समय तक माना जाता रहा कि अजित पवार ही शरद पवार की राजनीतिक विरासत संभालेंगे। हालांकि, साल 2009 में जब अजित की चचेरी बहन सुप्रिया सुले की राजनीति में एंट्री हुई, तो परिवार में फूट पड़ने की शुरुआत मानी गई। बावजूद इसके, अजित पवार ने हमेशा शरद पवार को एक ‘फादर फिगर’ (पिता समान) के रूप में देखा और पार्टी के बड़े फैसले उनकी मर्जी से ही लिए। लेकिन उनके काम करने के अंदाज में जमीन-आसमान का अंतर था। जहाँ शरद पवार कभी स्पष्ट बात नहीं कहते थे, वहीं अजित पवार अपनी बेबाकी के लिए मशहूर थे और किसी भी बात को लेकर ‘ना’ कहने से कभी नहीं हिचकिचाते थे।
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‘रोटी पलटने’ का वो किस्सा और ऐतिहासिक बगावत
हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा चर्चा शरद पवार के उस बयान की हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि “रोटी अगर सही समय पर न पलटे तो कड़वी हो जाती है”। 27 अप्रैल 2023 को दिए गए इस बयान के बाद अजित पवार की खुशी तब काफूर हो गई जब शरद पवार ने 2 मई को इस्तीफा दिया और फिर मात्र 4 दिन बाद उसे वापस ले लिया।
इस घटना के बाद अजित ने अपने रास्ते बदलने का मन बना लिया। 30 जून 2023 को उन्होंने विधायकों की एक अलग बैठक बुलाई। इसके ठीक दो दिन बाद, 2 जुलाई को अजित पवार ने अपने 30 समर्थकों के साथ पांचवीं बार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सबको चौंका दिया। उन्होंने देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सत्ता संभाली, लेकिन चाचा के साथ उनका रिश्ता पूरी तरह टूट गया।
चुनाव चिह्न की जंग: ‘राजनीतिक गला घोंटने’ का आरोप
अजित पवार की सबसे बड़ी जीत और विवाद तब सामने आया जब 6 फरवरी 2024 को चुनाव आयोग ने उन्हें एनसीपी का मूल चुनाव चिह्न ‘घड़ी’ आवंटित कर दिया। शरद पवार के हाथ से अपनी ही बनाई पार्टी और पहचान छीन ली गई, जिस पर उन्होंने गहरा दुख जताया था। इस फैसले के बाद शरद गुट के नेता जितेंद्र आव्हाड ने बेहद कड़ा बयान देते हुए कहा था कि अजित पवार ने शरद पवार का “राजनीतिक गला घोंट दिया है।”
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आज जब बारामती प्लेन हादसे के बाद अजित पवार इस दुनिया में नहीं हैं, तो बारामती से लेकर मुंबई तक उनके वो किस्से गूंज रहे हैं चाहे वह सुबह-सुबह फडणवीस के साथ शपथ लेना हो या फिर चाचा की छाया से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र सल्तनत खड़ी करना। उन्होंने राजनीति अपनी शर्तों पर की और जाते-जाते भी एक ऐसा खालीपन छोड़ गए जिसे भरना मुश्किल होगा।
