सत्ता के लिए स्वाभिमान का अंत और ‘विकास’ की माया, भाजपा की रणनीति में उलझी शिंदे सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस
Nashik Politics: नासिक की राजनीति में भाजपा, शिंदे सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के बीच सत्ता संतुलन, स्वाभिमान और ‘विकास’ की राजनीति पर उठते सवालों का विश्लेषण.
- Written By: आंचल लोखंडे
Nashik mayor election (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nashik Mayor Election: चुनावों में गठबंधन हो या सीटों का बंटवारा, जिस भाजपा ने शिंदे सेना को चर्चा के लिए घंटों इंतजार कराया और कभी तवज्जो नहीं दी, उसी ने आखिरी क्षणों में उसे उपमहापौर का पद थमा दिया। यह भाजपा की सोची-समझी चाल थी या मजबूरी, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन चुनावों में साथ न देकर दुर्गति करने वाली भाजपा से पद मिलते ही शिंदे सेना के नेताओं के बदले हुए बोल बताते हैं कि उनका स्वाभिमान केवल सत्ता तक सीमित है।
भाजपा ने शिंदे सेना को साथ लेकर क्या हासिल किया, इस पर अलग-अलग मत हैं। संभव है कि ‘आंवला देकर कद्दू निकालने’ में माहिर भाजपा ने नासिक जैसे ‘बी’ श्रेणी के नगर निगम में उपमहापौर का पद देकर राज्य में कहीं और अपना बड़ा हित साध लिया हो। सवाल यह भी है कि यदि साथ ही लेना था, तो चुनाव पूर्व गठबंधन क्यों नहीं किया? स्पष्ट है कि भाजपा चुनाव में शिंदे सेना को उसकी असली ताकत दिखाना चाहती थी। अब सत्ता में भागीदारी देकर भाजपा ने शिंदे सेना का मुंह बंद कर दिया है। अगले पांच साल तक भाजपा के पीछे चलने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस का शून्य का गणित:
शिंदे सेना की तरह ही नगर निगम चुनाव में अपनी लय खो चुकी राष्ट्रवादी कांग्रेस (राकांपा) ने महापौर चुनाव के एक दिन पहले भाजपा को ‘बिना शर्त’ समर्थन दे दिया। राजनीति में बिना किसी स्वार्थ के और भाजपा द्वारा मांगे बिना ही समर्थन देने का निर्णय बुद्धिमानी है या अपरिपक्वता, यह समझना कठिन है। चुनाव परिणामों ने पहले ही साफ कर दिया था कि पार्टी में अब ज्यादा जान नहीं बची है। जिले में पार्टी के जितने विधायक हैं, उतनी सीटें भी नगर निगम में नहीं आ सकीं, जो नेतृत्व की विफलता को दर्शाता है।
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अब भाजपा को समर्थन तो दे दिया गया है, लेकिन इसके बदले में किसे क्या मिलेगा, यह बड़ा सवाल है। भाजपा ने शिंदे सेना को उपमहापौर पद देकर शांत किया, लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस ने तो खुद ही अपना मुंह बंद कर लिया है। ऐसे में अगले पांच वर्षों तक जनता की आवाज उठाना उनके लिए मुश्किल नजर आता है।
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आम आदमी की पहुंच से दूर यह ‘विकास’
चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने के बाद भी केवल ‘विकास’ के नाम पर राजनीतिक दलों का गले मिलना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इस ‘विकास’ में इतनी ताकत है कि यह वर्षों की राजनीतिक दुश्मनी और स्वाभिमान को पल भर में खत्म कर देता है। इसी ‘विकास’ की खातिर भाइयों में झगड़े हुए, रिश्ते टूटे और पुलिस थानों तक चक्कर लगाने पड़े।
जनहित के मुद्दों पर संकट
सत्ताधारी और विपक्ष, दोनों के मतों को एक करने वाला यह ‘विकास’ विडंबना यह है कि आम जनता को नग्न आंखों से दिखाई नहीं देता। राजनेताओं का मानना है कि ‘विकास’ देखने के लिए उनके जैसी ‘दिव्य दृष्टि’ होनी चाहिए. महापौर और उपमहापौर का चुनाव निर्विरोध संपन्न कराने के पीछे भी इसी ‘विकास’ का बड़ा हाथ था। अब यह विकास अपना काम करके ओझल हो गया है, जो शायद सीधे पांच साल बाद ही अपनी महिमा दिखाने वापस आएगा।
