ZP Scam: नासिक जिला परिषद में 6 करोड़ का सोलर घोटाला, अफसरों ने ई-फाइलिंग छोड़ बैकडेटिंग कर किया खेल
Nashik ZP Scam: नासिक जिला परिषद में 6 करोड़ रुपये के सोलर प्रोजेक्ट में बड़े भ्रष्टाचार का खुलासा, ई-फाइलिंग के बजाय ऑफलाइन फाइलों के जरिए पारदर्शिता की धज्जियां उड़ीं, पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
- Written By: गोरक्ष पोफली
नासिक जिला परिषद भवन (सोर्स: सोशल मीडिया)
Backdating Nashik ZP Scam: नासिक जिला परिषद में 6 करोड़ रुपये का सोलर प्रोजेक्ट अब भ्रष्टाचार और प्रशासनिक धांधली का बड़ा केंद्र बन गया है। इस पूरे मामले में पारदर्शिता के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच एक गहरी सांठगांठ उजागर हुई है, जहां सिन्नर, कलवण और त्र्यंबकेश्वर जैसी तहसीलों में 15 से अधिक सोलर प्रोजेक्ट बिना किसी आधिकारिक वर्क ऑर्डर के ही स्थापित कर दिए गए।
नियमों को ताक पर रखकर पहले जलापूर्ति विभाग से अवैध तरीके से मंजूरी ली गई और अब घोटाले को दबाने के लिए सरकारी फाइलों में बैकडेटिंग में फर्जी दस्तावेज तैयार कर अवैध रूप से किए गए कार्यों को कानूनी जामा पहनाया जा रहा है।
सुनियोजित तरीके से डाला डाका
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ पूरी जिला परिषद ‘ई-फाइलिंग’ प्रणाली के माध्यम से भ्रष्टाचार मुक्त होने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं इस बहु-करोड़ी प्रोजेक्ट की फाइलों को जानबूझकर ऑफलाइन और हस्तलिखित तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि डिजिटल फुटप्रिंट न बचे और जांच के दौरान किसी भी हेरफेर को पकड़ा न जा सके। यह केवल एक प्रक्रियात्मक चूक नहीं, बल्कि सरकारी तिजोरी पर सुनियोजित तरीके से डाका डालने की कोशिश है।
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अधिकारियों की भूमिका सवालों के घेरे में
ग्राम पंचायत विभाग की उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी वर्षा फडोल की भूमिका सबसे ज्यादा विवादों में है। सूत्रों के अनुसार, वे खुद निर्माण विभाग में जाकर क्लर्कों के साथ बैठकर फाइलें ‘मैनेज’ करवा रही हैं। किसी वरिष्ठ अधिकारी का इस तरह क्लर्कों के साथ बैठकर फाइलें तैयार करवाना विभाग की मिलीभगत को जगजाहिर करता है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी ओमकार पवार ने काम रोकने के निर्देश तो दिए, लेकिन अब तक ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट न करना कई सवाल खड़े करता है। क्या प्रशासन जानबूझकर भ्रष्ट अधिकारियों को ‘क्लीन चिट’ दिलाने का रास्ता साफ कर रहा है?
प्रशासन का खोखला बचाव
प्रशासन का तर्क है कि अभी तक कोई भुगतान नहीं भुगतान न होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि भ्रष्टाचार नहीं हुआ, बल्कि पूरी प्रक्रिया को ही फर्जी तरीके से (बैकडेटिंग के जरिए) तैयार करना अपने आप में एक गंभीर अपराध है।
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उच्च स्तरीय जांच की दरकार
यह घोटाला सरकारी तंत्र में बैठे उन लोगों की पोल खोलता है जो नियमों को अपनी जेब में रखकर चलते हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि इस मामले की एंटी करप्शन ब्यूरो या किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से ब्यूरो या किसी स्वतंत्र जपचा से कार्रवाई नहीं हुई, तो जनता का सरकारी व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।
