नाशिक के खेतों में बदलाव! विश्व खाद्य दिवस पर जानिए कैसे प्याज, मक्का और सोयाबीन बन रहे हैं किसानों
Crop Pattern Change: विश्व खाद्य दिवस पर नाशिक में बदलते फसल पैटर्न का विश्लेषण; किसान अब प्याज, मक्का, सोयाबीन जैसे नकदी फसलों की ओर झुके, पारंपरिक दालें हो रही हैं गायब।
- Written By: अर्पित शुक्ला
File Photo
Nashik News: नाशिक। खेती की बढ़ती लागत और बाजार कीमतों में अस्थिरता के कारण नाशिक जिले के किसानों ने अपने ‘फसल पैटर्न’ में बड़ा बदलाव किया है। गन्ना, अंगूर, अनार और फूलों की खेती में अग्रणी रहा नाशिक जिला अब प्याज, मक्का और सोयाबीन के उत्पादन में आगे है। बाजरा, ज्वार, उड़द और मूंग जैसे पारंपरिक दालों का क्षेत्र तेजी से घट रहा है, और जिले की खेती अब नकदी फसलों की ओर ‘शिफ्ट’ हो रही है। 16 अक्टूबर, विश्व खाद्य दिवस मनाया जा रहा है, इस अवसर पर जिले में बदली हुई फसल प्रणाली पर ध्यान देना आवश्यक है।
जिले की भौगोलिक विविधता और नई फसलें
नाशिक जिले में प्राकृतिक विविधता पाई जाती है, जिसके तहत लगभग 6.25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर खरीफ और 1.99 लाख हेक्टेयर पर रबी की खेती की जाती है। इसके अलावा, लगभग 1.98 लाख हेक्टेयर पर फलों के बाग और सब्जियां उगाई जाती हैं, जिसमें फूलों की खेती भी शामिल है।
अधिक वर्षा वाले क्षेत्र: इगतपुरी, त्र्यंबकेश्वर और नाशिक जैसे अधिक वर्षा वाले आदिवासी तहसीलों में मुख्य रूप से धान (भातशेती) की खेती की जाती है।
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बागवानी क्षेत्र: निफाड, दिंडोरी, कलवण, देवला और बागलाण तहसीलों में अंगूर, अनार, स्ट्रॉबेरी और सब्जियों के बागान फल-फूल रहे हैं।
कम वर्षा वाले क्षेत्र: मालेगांव, नांदगांव, येवला, सिन्नर और चांदवड जैसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में मक्का, सोयाबीन और दालें मुख्य रूप से उगाई जा रही हैं।
किसानों के सामने बड़ी चुनौतियां
खेती की बढ़ती लागत, श्रमिकों की कमी और बाजार मूल्यों में मामूली वृद्धि के कारण किसानों की कठिनाइयां आज भी बनी हुई हैं। इसलिए उनका रुझान अब खेती के साथ-साथ पूरक व्यवसायों को अपनाने की ओर बढ़ रहा है। स्ट्रॉबेरी, रेशम की खेती, डेयरी व्यवसाय, मुर्गी पालन (पोल्ट्री) और बकरी पालन (गोट फार्म) जैसी पहलों के माध्यम से कुछ किसानों ने सफलता हासिल की है, जबकि अन्य मौसम की अनिश्चितताओं का शिकार हो रहे हैं।
श्रम (मजदूर) का संकट गंभीर चुनौती
- श्रम शक्ति में बदलाव: लोगों को आसानी से अनाज उपलब्ध होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूरों की काम करने की प्रवृत्ति में बदलाव आया है। महिलाओं के खातों में सीधे वित्तीय सहायता मिलने से भी मजदूरी के प्रति उनका आकर्षण कम हुआ है।
- परिणाम: किसानों को कुशल मजदूर मिलना मुश्किल हो गया है, और यदि वे मिलते भी हैं, तो उनकी मजदूरी वहन करना महंगा पड़ता है। आज ग्रामीण मजदूर शिक्षित हो रहे हैं, लेकिन उनकी अगली पीढ़ी पारंपरिक खेती के कामों में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। इन सब परिस्थितियों में, खेती के उत्पादन की लागत बढ़ रही है, जिससे किसानों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं।
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खेती में मुनाफा बनाए रखने के लिए नाशिक के किसान फसल पैटर्न बदल रहे हैं, लेकिन जब तक लागत, श्रमिकों की कमी और मौसम की अनिश्चितता जैसी समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक किसानों का संघर्ष जारी रहेगा।
