मराठी रंगमंच ठहरा हुआ है, 1985 और आज में फर्क नहीं -महेश मांजरेकर
Nashik Mahesh Manjrekar: महेश मांजरेकर ने कहा कि मराठी रंगमंच आज भी पुराने ढर्रे पर है। न टेक्नोलॉजी है, न प्रयोग। 1985 और आज के नाटकों में कोई फर्क नहीं दिखता, जो बेहद दुखद है।
- Written By: अंकिता पटेल
प्रतीकात्मक तस्वीर ( सोर्स: सोशल मीडिया )
Nashik Marathi Theatre: नासिक एक्टर-डायरेक्टर महेश मांजरेकर ने कहा कि आज के नाटकों और पहले के नाटकों में कोई अंतर नहीं है। यह दुख की बात है कि कुछ भी नहीं बदला है। कुछ ग्रुप्स को छोड़कर, हम अभी भी बॉक्स सेंट का आनंद ले रहे हैं। यह मराठी थिएटर की दुर्भाग्य है कि हमारे पास टेक्नोलॉजी पर आधारित थिएटर नहीं हैं।
मुझे 1985 में किए गए नाटक और आज के नाटक में कोई अंतर महसूस नहीं होता, यह दुखद है। हम ड्रामा में कोई एक्सपेरिमेंटेशन नहीं देखते, हम स्टेज पर बहुत पीछे हैं। वह दिगंत स्वराज फाउंडेशन द्वारा आयोजित तीन दिन के ‘उगम’ कल्चरल फेस्टिवल समापन समारोह में ‘मेरा साहित्य, मेरा मंच’ पर एक सेमिनार में बोल रहे थे।
अभिनेता किशोर कदम ने कहा कि ड्रामा, स्टेज, लिटरेचर सिर्फ आर्टिस्ट, एक्टर, डायरेक्टर, प्ले राइटर, राइटर की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि ऑडियंस को भी इस पर सोचना चाहिए, एक्टिवली हिस्सा लेना चाहिए और इस पर काम करना चाहिए, डायरेक्टर, प्ले राइटर विजय केनकरे, राइटर शफाअत खान ने भी बातचीत की।
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विजय केनकरे ने कहा कि ड्रामा लिटरेचर नहीं है, यह ओरिजिनल आर्ट फ़ॉर्म है और लिटरेचर भी इसमें आता है। आजकल के नाटकों को देखें तो थिएटर को देखने का नजरिया बदल गया है और यह बदलाव जरूरी है।
अच्छा नाटक स्टेज की ताकत
नाटकों में विजुअली सोचना जरूरी है। पहले, साई परांजपे महिला राइटर में अकेली महिला प्ले राइटर थी, लेकिन अब इस फील्ड में कई महिलाएं लिखती हुई दिख रही हैं। आज के बच्चे जानते हैं कि कहाँ और कितनी बात करनी है। यह टेक्नोलॉजी से जुड़ा है।
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शफाअत खान ने कहा कि इंटरटेनमेंट का मतलब है अपने सामने ऑडियंस को बांधकर रखना, खेलना, एंटरटेनमेंट का मतलब चिल नहीं है, हंसाना नहीं है। एक हराचना या रहस्यमयी नाटक भी ऑडियंस का एंटरटेनमेंट करता है। अच्छे नाटक ऑडियंस बनाते हैं। एक अच्छे नाटक में स्टेज की यहीं ताकत होती
