नागपुर: सरकारी मुद्देमाल गबन में दोषी कोर्ट क्लर्क को राहत नहीं, हाई कोर्ट ने 5 साल की सजा बरकरार रखी
Nagpur Government Funds Misuse: नागपुर में अदालत के मुद्देमाल गबन मामले में HC ने पूर्व प्रॉपर्टी क्लर्क की 5 साल की सजा बरकरार रखी। निरीक्षण के दौरान रिकॉर्ड में गड़बड़ी से घोटाले का खुलासा हुआ।
- Written By: अंकिता पटेल
मुद्देमाल गबन, हाई कोर्ट फैसला,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Embezzlement Case: नागपुर 1 जून 2001 से 31 मई 2005 तक सिविल जज जूनियर डिवीजन, सावनेर की अदालत में प्रॉपर्टी क्लर्क के पद पर कार्यरत कन्हैयालाल श्रवण दमाहे (56 वर्ष) कार्यकाल के दौरान सावनेर, खापा, कलमेश्वर, केलवद और खापरखेड़ा जैसे विभिन्न पुलिस स्टेशनों से पुलिस द्वारा अदालत में जमा किए जाने वाले ‘मुद्देमाल’ (नकद और कीमती संपत्ति) को प्राप्त करता था। अदालत में पेश सबूतों के अनुसार दमाहे ने कुल 2,45,989 रुपये का गबन किया और इसके अलावा 46,929 रुपये का अस्थायी गबन भी किया।
इस सरकारी राशि का उसने कुछ समय तक अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया और काफी देरी से कोर्ट के खाते में जमा करवाया। इस संदर्भ में दी गई सजा पर पुनर्विचार के लिए हाई कोर्ट में अर्जी दायर की गई जिस पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने सरकारी मुद्देमाल के गबन का दोषी पाते हुए उसकी 5 साल की कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
कैसे हुआ घोटाले का पर्दाफाश? इस पूरे घोटाले का खुलासा जून 2005 में सावनेर कोर्ट के वार्षिक निरीक्षण के दौरान हुआ, उत्कालीन अधीक्षक अपगी जोशी की निरीक्षण के दौरान पता चला कि पुलिस की रसीदों और अदालत के रजिस्टर के रिकॉर्ड मेल नहीं खा रहे हैं। पीठासीन अधिकारी और प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के संज्ञान में यह बात लाई गई जिसके बाद व्यापक स्तर पर जांच हुई और एफआईआर दर्ज की गई।
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ऐसे करता था हेराफेरी
दमाहे पुलिस कर्मियों से नकद और संपति प्राप्त कर उन्हें चालान रसीद पर हस्ताक्षर करके पावती दे देता था लेकिन जानबूझकर उन संपत्तियों की प्रविष्टि अदालत के संपति रजिस्टर मैं नहीं करता था।
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जांच में सामने आया कि उसने अपराध दर्ज करने के बाद प्रॉपर्टी रजिस्टर के कई पन्ने खाली छोड़ दिए थे। इसके अलावा उसने कुछ प्रविष्टियों को काटा और उन पर न तो खुद हस्ताक्षर किए और न ही पीतासीन अधिकारी से हस्ताक्षर करवाए।
निचली अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक सजा बरकरार
जिला सत्र न्यायालय के प्रथम श्रेणी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 14 मार्च 2014 को दमाहे को आईपीसी (IPC) की धारा 409 (लोक सेवक द्वारा आपराधिक विश्वासघात), 466 और 477 के तहत दोषी ठहराया था और उसे 5 वर्ष के कठोर कारावास तथा जुर्माने की सजा सुनाई थी।
इस फैसले को 7 अक्टूबर 2015 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा भी सही ठहराया गया था। निचली अदालतों के इसी फैसले के खिलाफ दमाहे ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।
