Nagpur University Exams: नागपुर विश्वविद्यालय में चल रही परीक्षा और परिणाम से जुड़ीं गंभीर समस्याओं के बीच छात्र राजनीति का एक अहम पहलू भी चर्चा में आ गया है। विश्वविद्यालय के सबसे बड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एबीवीपी की पूरी तरह से गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जहां एक ओर विश्वविद्यालय की परीक्षा व्यवस्था चरमरा गई है, परिणामों में भारी देरी हो रही है और छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है, वहीं एबीवीपी की ओर से अब तक कोई ठोस प्रतिक्रिया या आंदोलन सामने नहीं आया है। यह वही संगठन है, जो पिछले वर्षों में छात्र हितों के मुद्दों पर काफी सक्रिय और मुखर रहा है। वहीं दूसरी ओर छात्र संगठन एनएसयूआई लगातार इन मुद्दों को उठा रहा है और विश्वविद्यालय प्रशासन को घेरने का प्रयास कर रहा है।
एनएसयूआई द्वारा प्रदर्शन, ज्ञापन और मीडिया के माध्यम से छात्रों की समस्याओं को सामने लाने की कोशिशें जारी हैं लेकिन एबीवीपी की चुप्पी ने छात्रों को हैरान कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि जब छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है, तब इतना बड़ा और प्रभावशाली संगठन आखिर क्यों मौन है सवाल उठाने से बच रही है एबीवीपी।
सूत्रों के अनुसार विश्वविद्यालय में जो समस्याएं सामने आ रही हैं, उनका एक बड़ा कारण परीक्षा कार्य संभाल रही कंपनी की अक्षमता मानी जा रही है। ऐसे में यह चर्चा भी जोरों पर है कि एबीवीपी शायद जानबूझकर कंपनी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने से बच रही है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि कोई संगठन सामान्य परिस्थितियों में इतना सक्रिय रहता है, तो ऐसे गंभीर समय में उसकी चुप्पी स्वाभाविक नहीं मानी जा सकती।
विश्वविद्यालय के अंदरूनी सूत्रों और छात्र समुदाय में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या एबीवीपी किसी प्रकार के दबाव में है क्या संगठन पर अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा दबाव है कि वह इस मुद्दे पर आवाज न उठाए हालांकि, इस संबंध में संगठन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन लगातार बनी हुई चुप्पी ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
छात्रों में बढ़ रही नाराजगी इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अधिक असर छात्रों पर पड़ रहा है। परिणामों में देरी, तकनीकी गड़बड़ियां और प्रशासनिक निष्क्रियता के बीच छात्र पहले से ही परेशान हैं। ऐसे में छात्र संगठनों से उम्मीद थी कि वे उनकी आवाज बनेंगे, लेकिन एबीवीपी की निष्क्रियता ने छात्रों को निराश किया है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि छात्र संगठनों की भूमिका केवल चुनाव तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन्हें छात्रों के हितों की रक्षा के लिए हर परिस्थिति में सक्रिय रहना चाहिए। एबीवीपी जैसे बड़े संगठन की चुप्पी लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसकी भूमिका पर भी सवाल खड़ा करती है।