नागपुर में बड़ा शोध: सस्ते प्राकृतिक मीडिया से सूक्ष्मजीव संवर्धन, वैश्विक कंपनियों को चुनौती
Nagpur University Research: नागपुर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सूक्ष्मजीव संवर्धन के लिए सस्ता व प्राकृतिक विकल्प विकसित किया। इससे लैब लागत घटेगी और वैश्विक स्तर पर नई संभावनाएं खुलेंगी।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर विश्वविद्यालय शोध,(प्रतिकात्मक तस्वीर, सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Microbial Culture Media: नागपुर मानव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से विभिन्न चिकित्सा जांचों में उपयोगी प्रतिजैविकों (एंटीबायोटिक) सहित प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले सूक्ष्मजीवों का संवर्धन अब प्राकृतिक और टिकाऊ पदार्थों से करना संभव हो सकेगा, सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए अब तक उपयोग में आने वाले महंगे पोषण मीडिया के स्थान पर सस्ते और प्राकृतिक विकल्प विकसित किए गए हैं।
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के मॉलिक्यूलर बायोलॉजी एंड जेनेटिक इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ताओं ने इस दिशा में एक अभिनव और जैविक क्रांति लाने वाला महत्वपूर्ण शोध किया है।
इस शोध के माध्यम से न केवल सूक्ष्मजीव संवर्धन के लिए एक शाश्वत और किफायती विकल्प उपलब्ध हुआ है, बल्कि दुनिया भर की प्रयोगशालाओं और सूक्ष्मजीव आधारित उद्योगों में लंबे समय से चली आ रही कुछ विशेष कंपनियों की एकाधिकार व्यवस्था को भी चुनौती मिलेगी।
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यह शोध उपकुलपति डॉ. मनाली क्षीरसागर के मार्गदर्शन में विभाग प्रमुख डॉ. दयानंद गोगले के नेतृत्व में पूरा किया गया। संशोधन टीम में डॉ. माधुरी ठाकरे, यजुर्वेद सेलोकर, तनेश्वरी हिरापुरे, डॉ. रीना मेश्राम, डॉ. राखी शंभरकर और डॉ. ललिता सावरकर का समावेश है। दशकों से दुनिया भर की प्रयोगशालाएं मुख्यतः न्यूट्रिएंट आगार (1880 के दशक में रॉबर्ट कोच और फैनी हेसे द्वारा विकसित) और लूरिया-बटांनी (एलबी) माध्यम (1951 में ज्युसेप्पे बांनी द्वारा विकसित) पर निर्भर थीं।
‘प्लांट बेस्ड कल्चर मीडिया’ बना नया विकल्प
‘ए प्लांट बेस्ड कल्चर मीडिया फॉम्र्म्युलेशन फॉर कल्टीवेटिंग माइक्रोऑर्गनिज्म्स’ नामक इस शोध में वनस्पति आधारित पौषण मीडिया विकसित किया गया है। यह माध्यम सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए प्रभावी होने के साथ-साथ अत्यंत किफायती भी है।
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इस नवाचार से न केवल प्रयोगशालाओं में उपयोग होने वाले महंगे पौषण मीडिया का सस्ता विकल्प मिलेगा, बल्कि पैथोलॉजिकल जांच और सूक्ष्मजीवों से बनने वाली दवाओं के उत्पादन में भी भारी बचत होगी अनुमान है कि जांच और दवाओं की लागत 5 से 6 गुना तक कम हो सकती है।
यह खोज महंगे अंतरराष्ट्रीय मानकों को चुनौती देते हुए देशभर की प्रयोगशालाओं के लिए नई दिशा साबित होगी। इस शौच को भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय से प्रमाणपत्र भी प्राप्त हो चुका है।
