नागपुर यूनिवर्सिटी (सौजन्य-सोशल मीडिया)
RTMNU BCA BBA Fee Hike: राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की शुक्रवार को आयोजित सीनेट बैठक में बीसीए और बीबीए पाठ्यक्रमों की फीस में की गई भारी बढ़ोतरी का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। फीस में लगभग तीन गुना वृद्धि को लेकर वरिष्ठ सीनेट सदस्य डॉ. राजेश भोयर ने कड़ा विरोध दर्ज करते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
इस पर संज्ञान लेते हुए उपकुलपति डॉ. मनाली क्षीरसागर ने फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित करने के निर्देश दिए, जो फीस वृद्धि से संबंधित सभी तथ्यों की जांच करेगी। बैठक में डॉ. भोयर ने कहा कि आमतौर पर पाठ्यक्रमों की फीस से जुड़े परिपत्र जुलाई से अक्टूबर के बीच जारी किए जाते हैं, लेकिन बीसीए और बीबीए की फीस में तीन गुना वृद्धि से संबंधित आदेश मई 2025 में ही जारी कर दिया गया। उनके अनुसार यह प्रक्रिया निर्धारित नियमों और परंपरागत व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) के दिशानिर्देशों के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए पिछली शैक्षणिक वर्ष की फीस ही लागू रहनी चाहिए थी। इसके बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मई 2025 में ही नया परिपत्र जारी कर बढ़ी हुई फीस लागू कर दी, जो परिषद के निर्देशों से मेल नहीं खाता।
डॉ. भोयर ने निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठाए। उनका कहना था कि यदि किसी निर्णय के लिए केंद्र या राज्य सरकार की अनुमति आवश्यक बताई जाती है, तो उसी बैठक में लिए गए अन्य फैसलों के लिए अनुमति की आवश्यकता क्यों नहीं बताई गई। इससे प्रशासनिक निर्णयों में असंगति दिखाई देती है।
फीस वृद्धि के मुद्दे पर उपकुलपति ने स्पष्ट किया कि फीस निर्धारण का निर्णय उस समय के बोर्ड ऑफ डीन और शुल्क निर्धारण समिति द्वारा लिया गया था। इसी परिपत्र के आधार पर कई कॉलेजों ने छात्रों से छात्रवृत्ति के आवेदन भी भरवाए और कुछ विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिल चुकी है।
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ऐसे में अब उस निर्णय को पूरी तरह बदलना आसान नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति मिली है, उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ा है क्योंकि बढ़ी हुई राशि का भार सरकार ने वहन किया है। साथ ही कुछ महाविद्यालयों ने सामान्य वर्ग के छात्रों से भी बढ़ी हुई फीस नहीं ली है, ऐसी जानकारी विश्वविद्यालय को प्राप्त हुई है।
सीनेट बैठक में डॉ. भोयर ने पुराने पीएचडी शोधार्थियों को थीसिस जमा करने की दी गई छूट और बाद में उसे रद्द करने के फैसले पर भी सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि विद्वत परिषद ने पहले एक निर्णय लेकर पुराने शोधार्थियों को शोध प्रबंध जमा करने की अनुमति दी थी और इसके लिए विश्वविद्यालय ने दिशानिर्देश क्रमांक 33/2025 जारी किए थे।
हालांकि बाद में सीनेट में विरोध के चलते 16 दिसंबर 2025 को यह निर्णय वापस ले लिया गया। डॉ. भोयर का कहना था कि जिस प्रकार थीसिस जमा करने की अनुमति देने के लिए औपचारिक दिशानिर्देश जारी किए गए थे उसी प्रकार उस निर्णय को निरस्त करने के लिए भी स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिए थे, ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे।