सार्वजनिक जगह पर धूम्रपान (AI Generated Image)
Health Hazards Passive Smoking: ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया’ गीत की यह पंक्ति शहर की हकीकत को बखूबी बयां करती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां अब सिर्फ ‘फिक्र’ ही नहीं बल्कि कानून को भी धुएं में उड़ाया जा रहा है। राज्य में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान (Smoking) पर स्पष्ट प्रतिबंध होने के बावजूद नागपुर के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, सरकारी कार्यालयों के परिसर और व्यस्त चौक-चौराहों पर लोग बेखौफ सिगरेट के कश लगाते नजर आ रहे हैं।
अब सवाल उठने लगे हैं क्या कानून का डर खत्म हो गया है या फिर उसे लागू करने वाली व्यवस्था ही गायब हो गई है। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि यह सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ भी है। छोटे बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग जो खुद धूम्रपान नहीं करते वे भी इसके दुष्परिणाम झेलने को मजबूर हैं।
शहर में धूम्रपान मुक्त वातावरण बनाने के लिए प्रशासन को सख्त कदम उठाने की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार जनजागरूकता, नियमित जुर्माना और सार्वजनिक स्थानों पर स्पष्ट चेतावनी बोर्ड लगाने जैसी कार्यवाही से ही इस समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
शहर की पान की दुकानों, चाय स्टॉलों और सड़कों के किनारे दिनभर धूम्रपान चलता रहता है। खास बात यह है कि युवा वर्ग में धूम्रपान की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है और अब युवतियों की भागीदारी भी चिंता का विषय बन गई है। यह केवल व्यक्तिगत आदत नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सीधा हमला है। धूम्रपान नहीं करने वाले लोग भी इस जहरीले धुएं का शिकार बन रहे हैं।
कानून के अनुसार सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान (Smoking) दंडनीय अपराध है लेकिन जमीनी स्तर पर कार्रवाई लगभग शून्य है। नियम तोड़ने वालों में अब किसी तरह का डर नहीं बचा है। एक ओर नशीले पदार्थों के खिलाफ बड़ी-बड़ी कार्यवाही की जाती है वहीं रोजाना आंखों के सामने हो रही इस ‘धीमी जहरखोरी’ पर प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है।
सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान से न केवल कानून का उल्लंघन हो रहा है बल्कि निर्दोष नागरिकों की सेहत भी खतरे में पड़ रही है। पैसिव स्मोकिंग के कारण कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इस मुद्दे पर लापरवाही अक्षम्य है।
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वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ एड. फिरदोस मिर्जा ने बताया कि तंबाकू नियंत्रण के लिए देश में कड़े कानून मौजूद हैं। 2003 का सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2011 से लागू खाद्य सुरक्षा कानून, 2015 का जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2019 में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध और 2023 में स्कूलों के आसपास बिक्री पर रोक लेकिन इन कानूनों को लागू करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, फूड सेफ्टी अधिकारी, वेलफेयर अधिकारी और नगर निगम के स्वास्थ्य कर्मचारी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं। हकीकत यह है कि व्यवस्था ही नदारद है। ऐसे में आम नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने वाले ये कानून बेअसर साबित हो रहे हैं।