
वायु प्रदूषण (AI Generated Photo)
Nagpur Air Quality:नागपुर शहर को ‘ग्रीन सिटी’ बनाने के दावों के बीच वास्तविक स्थिति बिल्कुल उलट दिखाई देती है। सड़कों पर लगातार दौड़ते धुआं उड़ाते वाहन, पुराने ऑटो, जर्जर बसें और भारी वाहनों की भरमार ने शहर की हवा को इतना प्रदूषित कर दिया है कि ग्रीन सिटी का सपना धुएं की कालिख में धुंधला पड़ता जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर प्रशासन द्वारा कदमों की कमी और सड़कों पर अनियंत्रित रूप से बढ़ रहे वाहनों का दबदबा, इन दोनों ने मिलकर शहर के पर्यावरण को गंभीर खतरे में डाल दिया है।
शहर में करीब 25,000 से अधिक ऑटोरिक्शा चल रहे हैं जिनमें से बड़ी संख्या ऐसे वाहनों की हैं जिनका फिटनेस प्रमाणपत्र या तो समाप्त हो चुका है या कई वर्षों से नवीनीकरण नहीं हुआ है। वहीं शहर के सार्वजनिक परिवहन में शामिल स्टार बसों की हालत बद से बदतर हो चुकी है। इनमें से कई बसें 15 वर्ष से अधिक की उम्र पूरी कर चुकी हैं।
अस्थि-पंजर एक हो चुका है, फिर भी काला धुआं उड़ा रही इन बसों को शहर की सड़कों पर दौड़ाया जा रहा है। इनका काला धुआं वातावरण को विषैला बना रहा है। कई निजी बसों, स्कूल बसों और मालवाहक वाहनों की भी हालत इतनी खराब है कि हर स्टार्ट पर कई सेकंड तक धुएं का गुबार उठता है।
सड़क पर चलने वाले दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों के लिए यह धुआं किसी अभिशाप से कम नहीं है। कई स्थानों पर वाहन चालकों को आंखों में जलन, गले में तकलीफ और सांस लेने में दिक्कत जैसे लक्षण महसूस होते हैं।
डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से दमा, फेफड़ों का संक्रमण, एलर्जी और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है। चिंताजनक तथ्य यह है कि ऐसे रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों में। ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े लोग कई बार अपनी नाक और मुंह ढंककर खड़े रहने को मजबूर होते हैं।
प्रदूषण नियंत्रण विभाग और यातायात पुलिस की संयुक्त कार्रवाई की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है लेकिन धरातल पर ऐसी गतिविधियां बेहद कम दिखाई देती हैं। नियमों के अनुसार, हर वाहन के लिए प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पीयूसी) और फिटनेस टेस्ट अनिवार्य है, मगर इनकी जांच के लिए न तो पर्याप्त अभियान चलाए जा रहे हैं, न ही नियमों के उल्लंघन पर कड़ी सजा दी जा रही है।
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कभी-कभार कार्रवाई कर कुछ चालान काटे जाते हैं लेकिन इससे हालात में कोई विशेष सुधार नहीं होता। पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में शहर का एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) बेहद खराब श्रेणी में पहुंच सकता है जिससे स्वास्थ्य संबंधी संकट और गंभीर हो जाएगा।
सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री बढ़ाकर ग्रीन एनर्जी को बढा रही है लेकिन दूसरी ओर अपनी उम्र पूरी कर चुके पुराने वाहन भी उतनी ही तेजी से कार्बन बढ़ा रहे हैं। नागरिकों की मांग है कि यदि प्रशासन सचमुच ग्रीन सिटी विकसित करना चाहता है तो उसे सबसे पहले प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर तत्काल कड़ी कार्रवाई करनी होगी।
साथ ही शहर में स्वच्छ ईंधन आधारित सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया जाए और पुराने वाहनों के स्थान पर पर्यावरण-अनुकूल विकल्प उपलब्ध कराए जाएं। वर्तमान स्थिति स्पष्ट करती है कि ग्रीन सिटी का सपना सिर्फ घोषणाओं से नहीं बल्कि सख्त कदमों, जागरूक नागरिकों और प्रभावी प्रशासनिक कार्रवाई से ही पूरा हो सकता है। वरना धुएं की यह कालिख शहर के भविष्य को और अधिक अंधकारमय कर देगी।






