(प्रतीकात्मक तस्वीर)
Nagpur Playgrounds Encroachment Case: नागपुर के खेल मैदानों पर हो रहे अतिक्रमण, दुर्दशा एवं अवैध निर्माण को लेकर छपी खबरों पर स्वयं संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकृत किया। वर्ष 2013 में हाई कोर्ट ने इस पर संज्ञान लिया था जिसके बाद समय-समय पर सुनवाई के दौरान आदेश और निर्देश भी जारी किए गए। इस मामले में उस समय नियुक्त अदालत मित्र के अब जज बन जाने के कारण हाई कोर्ट ने अधिवक्ता भूषण मोहता को नये अदालत मित्र के रूप में नियुक्त कर 16 सितंबर तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी।
हाई कोर्ट ने खेल के मैदानों और विकास योजना में आरक्षित खुले मैदानों पर अतिक्रमण के नियमितीकरण को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की थी। विशेष रूप से ‘महाराष्ट्र गुंठेवारी विकास (नियमितीकरण, उन्नयन और नियंत्रण) अधिनियम, 2001’ के तहत किए गए कथित नियमितीकरण पर कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए थे।
जनहित याचिका की सुनवाई 18 दिसंबर 2013 से शुरू हुई। 19 मार्च 2014 को कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया। इस आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए कि मामले में अगले आदेश तक विकास योजना में खेल के मैदानों के लिए आरक्षित भूमि पर किसी भी अतिक्रमण का नियमितीकरण नहीं किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त वैधानिक प्रावधानों को चुनौती दिए जाने के कारण प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया गया और महाधिवक्ता (Advocate General) को भी इस जनहित याचिका की सूचना दी गई। 7 मई 2014 को इस अंतरिम आदेश को संशोधित किया गया जिसमें खेल के मैदानों के साथ-साथ खुले स्थानों (open space) पर भी अतिक्रमण के नियमितीकरण पर रोक लगा दी गई।
19 जनवरी 2017 को हाई कोर्ट में एक सिविल आवेदन किया गया जिसमें इस अंतरिम आदेश को रद्द करने की मांग की गई। किंतु हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए इसे रद्द करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अंतरिम आदेश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गुंठेवारी अधिनियम के प्रावधानों की आड़ में खेल के मैदानों और खुले स्थानों के लिए आरक्षित क्षेत्रों को अन्य उद्देश्यों के लिए नियमित नहीं किया जाए।
यह भी पढ़ें:- नागपुर मनपा दफ्तर से फाइलों की चोरी! दो ठेकेदार हुए ब्लैकलिस्ट, मचा हड़कंप
8 अगस्त 2018 की सुनवाई में प्रशासन द्वारा प्रस्तुत हलफनामे की जांच के दौरान कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। हलफनामे से पता चला कि राज्य सरकार ने 31 अगस्त 2004 को कोल्हापुर नगर निगम आयुक्त को एक पत्र लिखा था।
इस पत्र में कहा गया था कि यदि खेल के मैदान के रूप में विकास योजना के उपयोग को बदला जाना है और 2003 में खेल पर राज्य सरकार के निर्णय को लागू किया जाना है तो इसके लिए कैबिनेट की विशिष्ट स्वीकृति प्राप्त की जानी चाहिए जिस पर कोर्ट द्वारा कई सवाल उठाए गए।