नागपुर मनपा चुनाव: 18 साल का शासन और ‘जीरो’ परफॉर्मेंस! कांग्रेस ने भाजपा के विकास दावों की निकाली हवा
Nagpur Mayor Election: भाजपा के 18 साल के शासन को कांग्रेस ने बताया 'जीरो'। प्रभागों में 'एकला चलो रे' की रणनीति और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी।
- Written By: प्रिया जैस
कांग्रेस (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Municipal Election: नागपुर महानगरपालिका के चुनाव में अब बड़े नेताओं ने भी बागडोर संभाल ली है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गत 3 दिनों के भीतर ही भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की सभा और अन्य कार्यक्रमों का तांता लग गया है। एक ओर वरिष्ठ नेताओं द्वारा चुनाव की कमान संभाल लिए जाने के कारण चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के बीच जीत को लेकर उत्साह बढ़ता दिखाई दे रहा है।
वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से इस पर कड़ी टिप्पणी की जा रही है। कांग्रेस के प्रत्याशियों का मानना है कि चुनाव में अब तक भाजपा का प्रचार देखा जाए तो यह पूरी तरह से केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले प्रकल्पों पर निर्भर है।
जबकि वास्तविकता यह है कि लगभग 18 वर्षों तक महानगरपालिका पर सत्ता रखने वाली भाजपा का मनपा में परफॉर्मेंस जीरो है। यदि मनपा के माध्यम से विकास का कोई एजेंडा चलाया भी गया तो वह पूरी तरह से फेल हो गया। फिर भी जनता से मौका मांगा जा रहा है।
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कुछ प्रभागों में ‘एकला चलो रे’
जानकारों के अनुसार पार्टी को लाभ हो, इस उद्देश्य से ही महानगरपालिका चुनाव में प्रभाग पद्धति लागू की गई। कोई एक सदस्य कमजोर होने के बावजूद दूसरे प्रत्याशियों की मदद से कमजोर सीट भी निकाल लेने के उद्देश्य से प्रभागों के समीकरण भी तैयार किए गए किंतु जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज होता जा रहा है और प्रभागों के कुछ हिस्सों में संबंधित प्रत्याशी को लेकर कुछ नाराजगी दिखाई दे रही है।
वहां पर पार्टी के अन्य प्रत्याशी या तो अधूरे मन से संयुक्त प्रचार रैली में हिस्सा ले रहे हैं या फिर अपने विश्वस्तों के माध्यम से प्रभाग में अलग ही समीकरण बनाते दिखाई दे रहे हैं। कुछ प्रभागों में तो विपक्ष के प्रत्याशी के साथ अंदरखाने गठजोड़ कर एक दूसरे के लिए वोट मांगने का प्रयास भी होता दिखाई दे रहा है।
जानकारों की मानें तो कुछ प्रभागों में इस तरह का मामला उजागर होने के कारण वरिष्ठों से शिकायतें भी हो रही हैं किंतु ऐसे मुद्दे सार्वजनिक न हों और पार्टी को नुकसान न हो, इसीलिए शांति बनाए रखने के निर्देश प्रत्याशियों को दिए जा रहे हैं।
प्रचार नहीं, फिर भी जीतेंगे चुनाव
कुछ प्रत्याशियों का मानना है कि चुनाव जीतने के लिए केवल प्रचार नहीं बल्कि रणनीति भी बनानी पड़ती है। चुनाव को लेकर भाजपा काफी पहले ही रणनीति बना लेती है जिस पर बूथ स्तर तक के कार्यकर्ता काम करते हैं। यही कारण है कि प्रचार नहीं होने के बाद भी चुनाव में जीत दर्ज होती है, जबकि विपक्ष हारने के बाद इसे मुद्दा बनाकर कुछ अलग ही राग आलापता है।
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तकनीक की मदद से दुष्प्रचार
सूत्रों के अनुसार कुछ राजनीति दलों द्वारा तकनीक का सहारा लेकर विपक्षी दल के प्रत्याशी का दुष्प्रचार करने के भी मामले उजागर हो रहे हैं। इस तरह के मामले विशेष रूप से जिन प्रभागों में कांटे की टक्कर मानी जा रही है वहां पर अधिक संख्या में उजागर हो रहे हैं।
इस तरह के दुष्प्रचार में धन बल का उपयोग होने के कारण बड़ी मात्रा में सोशल मीडिया के माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित किए जाने के आरोप हो रहे हैं। धनबल की कमी के चलते मतदाताओं तक पहुंच नहीं होने से विपक्षी प्रत्याशियों को इसका नुकसान होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
