नागपुर हाई कोर्ट का अहम आदेश, 2013 कानून के तहत मिलेगा मुआवजा; एपीएमसी की याचिका खारिज
Nagpur High Court Verdict: नागपुर हाई कोर्ट ने एपीएमसी की याचिका खारिज कर भूस्वामियों को 2013 के कानून के तहत मुआवजा देने का आदेश बरकरार रखा।
- Written By: अंकिता पटेल
हाई कोर्ट, एपीएमसी मामला, (प्रतीकात्मक तस्वीर सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Land Acquisition: नागपुर हाई कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में नागपुर कृषि उत्पन्न बाजार समिति (एपीएमसी) को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने एपीएमसी की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें 1 दिसंबर 2015 को पारित भूमि अधिग्रहण मुआवजे के आदेश को चुनौती दी गई थी।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि भूस्वामियों को ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ (2013 का नया अधिनियम) के तहत ही मुआवजा मिलेगा।
मौजा चिखली (देवस्थान) स्थित सर्वे नंबर 114/1A की 1.72 हेक्टेयर भूमि पर साखरकर, साकोरे और अन्य परिवारों का स्वामित्व था। एपीएमसी के विस्तार और विकास के लिए इस जमीन को वर्ष 2001 में आरक्षित किया गया था और 2009 में अधिग्रहण का प्रस्ताव कलेक्टर के समक्ष रखा गया था।
सम्बंधित ख़बरें
नागपुर नेचर एक्सपीरियंस 2026: बुद्ध पूर्णिमा पर ताडोबा में अनोखी पहल, पर्यटक भी बनेंगे वन्यजीव गणना का हिस्सा
हज यात्रियों को बड़ा झटका, हवाई किराए में ₹10,000 की भारी बढ़ोतरी, अब चुकानी होगी इतनी रकम
उत्तर नागपुर में सफर बना चुनौती, मेट्रो प्रोजेक्ट की रफ्तार धीमी, जनता रोज झेल रही परेशानी; कब मिलेगी राहत?
Arms License Verification: स्टेटस सिंबल बना हथियार रखना पड़ा भारी, पुणे पुलिस ने 289 लाइसेंस किए रद्द
स्थानीय निकाय को अधिकार नहीं
अदालत ने फैसले में कहा कि 2013 के नए कानून की धारा 24(1) (a) बिल्कुल स्पष्ट है। इसके तहत यदि अधिग्रहण की प्रक्रिया पुराने कानून के तहत शुरू हुई है लेकिन 1 जनवरी 2014 से पहले धारा 11 के तहत कोई अवार्ड (अंतिम आदेश) पारित नहीं हुआ है, तो मुआवजे का निर्धारण पूरी तरह से 2013 के नए कानून के अनुसार ही किया जाएगा।
इस मामले में अंतिम अवार्ड 1 जनवरी 2014 के बाद (1 दिसंबर 2015 को) आया, इसलिए नए कानून का लागू होना पूरी तरह से वैधानिक है। अधिग्रहण करने वाले निकाय को यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि कौन सा कानून लागू होगा क्योंकि यह किसी की इच्छा पर नहीं बल्कि कानूनी ढांचे पर निर्भर करता है।
कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी के आदेश में किसी भी प्रकार की मनमानी या अवैधता से इनकार करते हुए उस अवार्ड को सही ठहराया। अंततः कोर्ट ने एपीएमसी की सभी दलीलों को खारिज करते हुए याचिका को रद्द कर दिया।
15.75 करोड़ का तय हुआ था मुआवजा
एपीएमसी की मुख्य दलील यह थी कि चूंकि अधिग्रहण की यह प्रक्रिया पुराने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894′ और MRTP एखट, 1966 के तहत शुरू हुई थी, इसलिए मुआवजे की गणना भी 1894 के पुराने कानून के आधार पर ही होनी चाहिए। एपीएमसी का यह भी आरोप था कि डिप्टी कलेक्टर द्वारा नए कानून (2013) के लागू करने से मुआवजे की राशि में भारी अनुचित वृद्धि हो गई है।
भूमि अधिग्रहण अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) ने किसानों के आवेदन को मानते हुए 1 दिसंबर 2015 को अपना अवार्ड पारित किया था और 2013 के नए अधिनियम के प्रावधानों को लागू करते हुए 15,75.86.970 रुपये का भारी भरकम मुआवजा तय किया था।
यह भी पढ़ें:-नागपुर नेचर एक्सपीरियंस 2026: बुद्ध पूर्णिमा पर ताडोबा में अनोखी पहल, पर्यटक भी बनेंगे वन्यजीव गणना का हिस्सा
इस आदेश के बाद एपीएमसी ने विरोध दर्ज कराते हुए 16,70.42.188 रुपये की राशि जमा की थी। इसके बाद फरवरी 2016 में तहसीलदार के माध्यम से जमीन का कब्जा एपीएमसी को सौंप दिया गया था और मार्च 2016 में भूम्यामियों ने अपना मुआवजा प्राप्त कर लिया था।
