Nagpur Politics: थम गई प्रचार तोपें, अब ‘चूहा बैठकों’ का दौर, 10 दिनों में 1617 रिकॉर्डतोड़ रैलियां
Election Campaign: नागपुर महानगरपालिका चुनाव में प्रचार थमने के बाद अब ‘चूहा बैठकों’ और माइक्रो-प्लानिंग का दौर तेज हो गया है, जहां बूथ मैनेजमेंट से जीत-हार तय होगी।
- Written By: आंचल लोखंडे
Election Campaign: नागपुर महानगरपालिका चुनाव (सोर्सः सोशल मीडिया)
Nagpur Municipal Election: नागपुर महानगरपालिका चुनाव के रण में पिछले कई दिनों से गूंज रही प्रचार की तोपें और लाउडस्पीकर आखिरकार खामोश हो गए हैं। चुनाव आयोग की समय-सीमा समाप्त होते ही रैलियों, रोड-शो और बड़े भाषणों का दौर थम गया है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि चुनावी सरगर्मी खत्म हो गई है। बल्कि अब असली ‘खेला’ उन बंद कमरों और गुप्त ठिकानों पर शुरू हो गया है, जिसे सियासी गलियारों में ‘चूहा बैठकें’ कहा जाता है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, जब खुली रैलियां और मंचीय प्रचार वर्जित हो जाते हैं, तब ‘अदृश्य राजनीति’ शुरू होती है। चूहा बैठकें वे छोटी-छोटी गुप्त बैठकें होती हैं, जो मोहल्लों, कार्यकर्ताओं के घरों या किसी अनजान ठिकाने पर रात के अंधेरे में आयोजित की जाती हैं। चुनाव प्रचार के लिए मिले लगभग 10 दिनों में सभी राजनीतिक दलों ने पूरा दमखम लगाया। नेताओं और स्टार प्रचारकों के माध्यम से न केवल बड़ी सभाएं की गईं, बल्कि इन्हीं 10 दिनों के भीतर कुल 1617 रैलियां आयोजित की गईं।
मतदान बढ़ाने की माइक्रो-प्लानिंग
अब भले ही प्रचार सभाएं समाप्त हो चुकी हों, लेकिन माइक्रो-प्लानिंग का गणित शुरू हो गया है। प्रचार के दौरान किन क्षेत्रों में नाराजगी है, कहां विपक्षी प्रत्याशी मजबूत स्थिति में है। ऐसी जगहों पर कुछ वोट अपनी ओर खींचने का प्रयास चूहा बैठकों के जरिए किया जा रहा है। कौन सा मोहल्ला कमजोर है, किस समाज को अभी साधना बाकी है और कौन सा कार्यकर्ता नाराज है। इसका पूरा खाका तैयार कर “कत्ल की रात” (मतदान से ठीक पहले की रात) तक बैठकों का सिलसिला चलता रहता है।
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लास्ट मिनट मैनेजमेंट का खाका
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, प्रचार थमने और मतदान के बीच के ये 48 घंटे हार-जीत का फैसला करने में सबसे अहम होते हैं। रात के ‘ऑपरेशन’ और रणनीतियों के तहत अब उम्मीदवारों का ध्यान मंच से हटकर सीधे बूथ मैनेजमेंट पर केंद्रित हो गया है। कार्यकर्ता घर-घर जाकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उनके पक्के मतदाता घर पर रहें और मतदान केंद्र तक पहुंचें। टिकट न मिलने या अन्य कारणों से नाराज बैठे कार्यकर्ताओं को मनाने के लिए दिग्गज नेता खुद उनके दरवाजे तक पहुंच रहे हैं।
गठजोड़ की गुप्त सेटिंग
अंतिम समय में छोटे दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के साथ पर्दे के पीछे समझौते की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। लाउडस्पीकर भले ही बंद हों, लेकिन मोबाइल के नोटिफिकेशन पूरी तरह चालू हैं। व्हाट्सएप ग्रुप्स में अब व्यक्तिगत मैसेज, वीडियो अपील और प्रतिद्वंद्वी की कमियों को उजागर करने वाले क्लिप तेजी से वायरल किए जा रहे हैं। चूहा बैठकों की रणनीति अब डिजिटल स्पेस में भी गहरी पैठ बना चुकी है।
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प्रशासन की पैनी नजर
प्रशासन भी इन चूहा बैठकों और गुप्त गतिविधियों से अनजान नहीं है। फ्लाइंग स्क्वॉड और स्टेटिक सर्विलांस टीमें सक्रिय कर दी गई हैं, ताकि किसी भी तरह के अवैध लेन-देन या प्रलोभन पर तुरंत कार्रवाई की जा सके। बाहरी नेताओं को पहले ही क्षेत्र छोड़ने के निर्देश दिए जा चुके हैं। महानगरपालिका की सत्ता की चाबी किसके हाथ लगेगी, इसका फैसला अब खुले मैदानों में नहीं, बल्कि इन्हीं गलियों और बंद कमरों की बैठकों में तय हो रहा है। प्रचार की तोपें भले ही ठंडी पड़ गई हों, लेकिन ‘सियासी चूहे’ अपनी बिसात बिछाने के लिए पूरी रात जागते नजर आ रहे हैं।
