हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
Maratha Kunbi GR Challenge: नागपुर में मराठा समुदाय को कुणबी प्रमाणपत्र देने के संबंध में जारी सरकारी जीआर के खिलाफ दायर याचिका पर हाई कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए 4 सप्ताह का अतिरिक्त समय प्रदान किया। राष्ट्रीय ओबीसी मुक्ति मोर्चा के मुख्य संयोजक नितिन चौधरी द्वारा याचिका दायर की गई जिसमें सरकार के 2 प्रमुख निर्णयों को चुनौती दी गई है।
ओबीसी संगठनों का मानना है कि सरकार चुनावी लाभ के लिए इस जीआर को रद्द नहीं करेगी, इसीलिए उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई सरकार द्वारा जवाब दाखिल किए जाने के बाद होगी जिससे यह स्पष्ट होगा कि मराठा-कुणबी प्रमाणपत्र की यह प्रक्रिया कानूनी रूप से कितनी वैध है।
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से 2 सितंबर 2025 के उस जीआर को चुनौती दी है जिसमें मराठा व्यक्तियों को कुणबी प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इसके साथ ही, 25 जनवरी 2024 के उस निर्णय को भी चुनौती दी गई है जिसके तहत वंशावली मिलान की कार्यवाही के लिए एक समिति गठित की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार ने चुनाव के दबाव में आकर मौजूदा जाति, जाति वैधता और वंशावली सत्यापन से संबंधित कानूनों और नियमों को ताक पर रखकर ये जीआर जारी किए हैं।
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सूत्रों के अनुसार हैदराबाद गजेटियर में मराठा और कुणबी समुदायों के संयुक्त उल्लेख को आधार बनाकर यह आंदोलन शुरू हुआ था। याचिका में दावा किया गया है कि सरकार ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक लाभ के लिए कानूनों की अनदेखी की है।
ओबीसी संगठनों का तर्क है कि इन जीआर के कारण मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र में स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं की ओबीसी आरक्षित सीटों पर कुणबी-मराठा प्रमाणपत्रों का दबदबा बढ़ गया है। संगठनों को आशंका है कि जिला परिषद चुनावों में इसका व्यापक असर पड़ेगा और ओबीसी का वास्तविक कोटा प्रभावित होगा। याचिकाकर्ता नितिन चौधरी की ओर से अधि। भूपेश पाटिल ने पैरवी की।