कोयला सप्लाई ठप - प्रशांत मोहोता (सौजन्य-नवभारत)
Indonesia Coal Import: युद्ध की आंच में सभी कुछ ‘तप’ रहा है। अब मार्केट में कोयले की कीमतें बढ़ गई हैं। भले ही कोल कंपनियों की दरें स्थिर हों लेकिन खुले बाजार में प्रति टन 1,200-1,500 रुपये का प्रीमियम बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि एक ओर गैस की किल्लत बढ़ गई है, जबकि दूसरी ओर विदेश से आने वाला कोयला सीमित हो गया है।
दोनों परिस्थितियों के कारण स्थानीय कोयला अब मुंहमांगी कीमत पर बिक रहा है क्योंकि उद्योग संचालकों के सामने कोई और विकल्प नहीं रह गया है। सूत्रों ने बताया कि इंडोनेशिया ने अपनी नीतियों में भी बदलाव किया है। एक ओर जहां उत्पादन कम किया है, वहीं लेन-देन सरकारी बैंकों के माध्यम से करने का निर्णय लिया है। लिहाजा इसका व्यापक असर पूरे विश्व के मार्केट में पड़ा है।
इतना ही नहीं, युद्ध के कारण आने वाले कोयले की ‘रफ्तार’ भी धीमी पड़ गई है। जहाज की लागत बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ गई है। परिवहन लागत बढ़ने से विदेशी कोयला भी मार्केट में महंगा हो गया है।
जानकारों ने बताया कि पहले जो विदेशी कोयला बाजार में 8,000-9,200 रुपये प्रति टन चल रहा था वह अब 11,000 और 11,500 रुपये प्रति टन के स्तर पर पहुंच गया है। कोयला कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि युद्ध की स्थिति ऐसी ही बनी रही तो आने वाले दिनों में विदेशी कोयला और महंगा हो सकता है क्योंकि उद्योगों की मांग बढ़ेगी और माल की कमी रहेगी।
कोयला किसी भी उद्योग के लिए अहम कच्चा माल है। इसकी लागत बढ़ने से उद्योग जगत हिल गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि उपलब्धता भी कम होती जा रही है। इससे संकट और बढ़ता जा रहा है। उद्यमियों का कहना है कि अगर स्थिति पर सरकार ध्यान नहीं देती है तो उद्योगों का संचालन मुश्किल हो जाएगा।
एक ओर राज्य और केंद्र सरकार एमएसएमई (सूक्ष्य, लघु, मझोले और मध्यम उद्योग) की बात करती है वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन (एमएसएमसी) से उन्हें कोयला नहीं मिल रहा है। कोयला कोटा जारी करने वाली फाइल पिछले काफी समय से मंत्रालय में अधिकारी ‘दबाये’ बैठें हैं। ऐसे में छोटे उद्यमियों के लिए मार्केट से कोयला लेने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। यह उनके लिए कष्टकर साबित हो रहा है, इसलिए छोटे उद्योग सबसे अधिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं।
इस बीच, वेकोलि के अधिकारियों का कहना है कि गर्मी के दिनों में पावर हाउस को अधिक कोयले की जरूरत होती है, इसलिए मांग में तेजी है। वेकोलि की ओर से रोजाना 25 से 26 रैक की आपूर्ति की जा रही है। यह आम दिनों से अधिक होता है।
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इस बीच, कई व्यापारियों और उद्यमियों का आरोप है कि कई खदानों से दिए जा रहे कोयले में बड़े पैमाने पर पत्थर मिलाया जा रहा है। ये पत्थर उद्योगों की मशीनों के लिए घातक बन गए हैं। अनेक उद्योगों को इसका झटका भी लग चुका है। वेकोलि प्रबंधन को इसकी शिकायत भी की गई है लेकिन मुख्यालय इस पर अब तक दखल नहीं दे रहा है। लाभ कमाने के चक्कर में क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी ऐसा कारनामा कर रहे हैं।
उद्योग पर केवल कोयले की मार नहीं पड़ रही है बल्कि केमिकल, प्लास्टिक, रंग जैसे कच्चे माल की कीमतें भी काफी बढ़ गई हैं। उत्पादन लागत में कम से कम 20 फीसदी का इजाफा हो रहा है। ऐेसे में हर चीज की कीमत बढ़ना उद्यमियों के लिए मजबूरी हो चुकी है। विदेशी कोयला 25 फीसदी तो देसी कोयला 15 फीसदी तक महंगा हो गया है। समस्याएं दिनोंदिन गहराती जा रही हैं। इसका समाधन जल्द निकालना जरूरी हो गया है।
प्रशांत मोहोता, अध्यक्ष, वीआईए