फुटाला नहीं है ‘वेटलैंड’, अस्थायी निर्माण को सुप्रीम कोर्ट ने दी हरी झंडी, HC के फैसले को रखा बरकरार
Nagpur News: नागपुर के फुटाला तालाब में हुए अस्थायी निर्माण के खिलाफ हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में स्वच्छ एसोसिएशन ने चुनौती दी। इस पर लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
- Written By: प्रिया जैस
फुटाला पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (सौजन्य-सोशल मीडिया)
Nagpur Futala Lake: फुटाला तालाब के संदर्भ में हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए स्वच्छ एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की। इस पर लंबी सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारीया की पीठ ने मंगलवार को फैसला देते हुए फुटाला तालाब को ‘वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत ‘आर्द्रभूमि’ (वेटलैंड) के रूप में वर्गीकृत करने से इनकार कर दिया, साथ ही हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को बरकरार रखा।
इस निर्णय के साथ ही राज्य प्राधिकरणों को तालाब के आसपास अस्थायी निर्माण जैसे कि फ्लोटिंग रेस्तरां, बैंक्वेट हॉल, म्यूजिकल फाउंटेन और व्यूइंग गैलरी के साथ आगे बढ़ने की अनुमति मिल गई है। नागपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एसके मिश्रा ने सुको में कहा कि तालाब 2017 के नियमों के तहत ‘आर्द्रभूमि’ (वेटलैंड) की परिभाषा में नहीं आता, खासकर इसलिए क्योंकि यह एक मानव निर्मित जल निकाय है।
सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर चिंता
याचिकाकर्ता ने वेटलैंड्स (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने तर्क दिया कि अस्थायी संरचनाओं के निर्माण से तालाब की पारिस्थितिकी को नुकसान होगा और यह नियम 2017 का उल्लंघन है। एनजीओ ने यह भी कहा था कि निर्माण योजना और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की अनदेखी की गई है और तालाब को उसकी मूल स्थिति में बहाल करने के लिए लोक न्यास सिद्धांत और एहतियाती सिद्धांत पर भरोसा किया।
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मानव निर्मित जल निकाय
राज्य और अन्य प्रतिवादियों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि फुटाला तालाब एक मानव निर्मित जल निकाय है, न कि 2017 के नियमों के नियम 2(1)(g) के तहत परिभाषित ‘वेटलैंड’ है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सभी आवश्यक अनुमतियां और स्वीकृतियां जिनमें 2019 और 2022 की मंजूरी, हेरिटेज समिति की मंजूरी और नगर विकास विभाग की मंजूरी विधिवत प्राप्त की गई है। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ देरी और शिथिलता का मुद्दा भी उठाया गया था।
