क्या आपका बच्चा भी करता है शरारत और पढ़ाई से जी चुराता है? हो सकती है यह बीमारी, नागपुर AIIMS का बड़ा खुलासा
Learning Disability in Children: नागपुर एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों का शरारती होना या होमवर्क न करना केवल आलस नहीं, बल्कि सीखने में अक्षमता का लक्षण हो सकता है।
- Written By: आकाश मसने
AIIMS नागपुर की डॉ. मीनाक्षी गिरीश बाेलीं- सीखने में अक्षम होने के कारण बच्चे होते हैं शरारती (डिजाइन फोटो)
AIIMS Nagpur Experts On Learning Disability in Children: महाराष्ट्र के नागपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के बाल रोग विशेषज्ञों ने बच्चों के व्यवहार को लेकर एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला खुलासा किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी बच्चे के चुलबुल व्यवहार, अक्सर होमवर्क न करने, कक्षाओं में मसखरापन करने या उसके शरारती होने को आमतौर पर उसके अवज्ञाकारी या आलसी होने से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन असल में ऐसा उसके सीखने में अक्षम (Learning Disability) होने की वजह से होता है।
एम्स नागपुर के बाल रोग विभाग की प्रमुख डॉ. मीनाक्षी गिरीश के अनुसार, ऐसे बच्चों में आमतौर पर सामान्य या उच्च बौद्धिक स्तर (IQ) होता है। हालांकि, जब सीखने के साथ उनके संघर्षों को व्यवहार संबंधी कमियों के रूप में समझा जाता है, तो वे गहरे भावनात्मक तनाव का सामना करते हैं।
डॉ. मीनाक्षी गिरीश ने बताया कि ये चिकित्सा से जुड़ी समस्याएं हैं, जो एक बच्चे के लिए सीखने में परेशानी का कारण बनती हैं। उदाहरण के लिए, उन्हें पढ़ने, लिखने या गणित के प्रश्न हल करने में कठिनाई हो सकती है। यह महसूस किए बिना कि उन्हें वास्तव में कोई चिकित्सीय समस्या हो सकती है, शिक्षकों द्वारा उन्हें ‘अवज्ञाकारी’ या ‘पढ़ाई में कमजोर’ और माता-पिता द्वारा ‘जिद्दी’ करार दिया जाता है।
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चिकित्सीय समस्या को समझें माता-पिता
एम्स नागपुर के बाल रोग विभाग की प्रमुख डॉ. मीनाक्षी गिरीश ने सलाह दी कि माता-पिता को ऐसे बच्चों को डांटने से परहेज चाहिए और इसके बजाय उन्हें एक मानक पेपर-आधारित मूल्यांकन के माध्यम से पेशेवर मूल्यांकन का रास्ता अपनाना चाहिए।
यूनिसेफ इंडिया और महाराष्ट्र के पत्र सूचना कार्यालय (PIB) द्वारा बचपन के गैर-संचारी रोग (NCD) पर मीडिया की क्षमता को मजबूत करने के लिए यहां आयोजित एक कार्यशाला से इतर डॉ. मीनाक्षी गिरीश ने समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा कि हम अपने एनसीडी क्लीनिक में हर महीने 6 से 8 ऐसे बच्चों को देखते हैं, जो सीखने में अशक्त होते हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार, भारत में ऐसी अशक्तता की व्यापकता 2.16 प्रतिशत से 30.77 प्रतिशत के बीच है। हालांकि, मामले और भी अधिक हो सकते हैं क्योंकि सटीक डेटा के लिए कोई राष्ट्रीय रजिस्ट्री नहीं है।
यूनिसेफ की रिपोर्ट और आंकड़े
यूनिसेफ की स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. अन्नपूर्णा कौल ने कहा कि भारत में स्कूल जाने वाली आबादी का कम से कम 10 से 20 प्रतिशत, 40 बच्चों की औसत कक्षा में लगभग चार से पांच छात्र सीखने में अशक्त होते हैं।
डॉ. मीनाक्षी गिरीश ने कहा कि कुछ बच्चों को कक्षा में जो कुछ पढ़ाया जाता है उसके कुछ हिस्सों को समझने में असमर्थ होते हैं। कुछ लोग अंग्रेजी या गणित से जूझते हैं, जबकि अन्य को अक्षरों को पहचानना भी मुश्किल होता है। उन्होंने कहा कि इन बच्चों में आम तौर पर एक सामान्य या यहां तक कि उच्च आईक्यू होता है और अक्सर अन्य क्षेत्रों में वे उल्लेखनीय क्षमता का प्रदर्शन भी करते हैं।
AIIMS नागपुर के बाल रोग विभाग की प्रमुख ने बताया कि ये बच्चे होनहार होते हैं। उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से उन गतिविधियों पर स्थानांतरित हो जाता है जिनका वे आनंद लेते हैं और जिनमें वे अच्छा प्रदर्शन करते हैं। दुर्भाग्य से, हम अक्सर उन्हें ‘मस्तीखोर’ कहते हैं, जबकि वास्तव में वे एक तरह की अशक्तता का सामना कर रहे होते हैं।
उन्होंने कहा कि अधिगम अशक्तता से पीड़ित बच्चे कक्षाओं में बेपरवाह दिखाई पड़ते हैं, जब पढ़ाया जा रहा होता है तो वह बगलें झांकते हैं और होमवर्क पूरा नहीं करते हैं, ऐसे में शिक्षक और माता-पिता उसे अनुशासनहीन और शरारती मान बैठते हैं। उन्होंने कहा कि आम तौर पर इस तरह के व्यवहार पर पहली नजर शिक्षकों की ही पड़ती है लेकिन कई लोग सीमित जागरूकता के कारण इसे संभावित अशक्तता के रूप में पहचानने में विफल रहते हैं और जब इससे संबंधित शिकायतें अभिभावकों तक पहुंचती हैं तो उन्हें लगता है कि उनका बच्चा शरारती है।
स्कूल और घर पर आलोचना का असर
डॉ. गिरीश ने कहा कि स्कूल और घर पर बार-बार आलोचना ऐसे बच्चों को काफी भावनात्मक तनाव में डाल सकती है, जिससे उनके आत्मविश्वास, व्यवहार और सीखने की इच्छा प्रभावित हो सकती है और वे किसी न किसी कारण से स्कूल जाने से भी मना कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता शायद ही कभी हमारे पास आते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में कमजोर है। वे आमतौर पर कहते हैं कि बच्चा उनका कहा नहीं सुनता है। हमारा काम वास्तविक समस्या की पहचान करना है।
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डॉ. गिरीश ने कहा कि ऐसे बच्चों को उपचारात्मक शिक्षा से लाभ होता है, जो उनकी क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करता है और साथ ही उन विषयों में सहायता प्रदान करता है जो उन्हें कठिन लगते हैं। उन्होंने बताया कि ये बच्चे दिव्यांगजनों के अधिकारों के ढांचे के तहत कई शैक्षिक रियायतों और सहायता के हकदार हैं ताकि वे पीछे न रहें और उन्हें उन क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए जहां वे योग्यता दिखाते हैं।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय में सहायक महानिदेशक डॉ. तुषार नाले ने कहा कि देश में होने वाली कुल मौतों में से करीब 66 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों से होती हैं। एनसीडी में मधुमेह, मोटापा, मानसिक विकार और अन्य उपचार योग्य बीमारियां शामिल हैं।
(एजेंसी इनपुट के साथ)
