

AIIMS Nagpur Staff Shortage: वर्धा रोड स्थित मिहान परिसर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नागपुर में मरीजों को अपेक्षित स्तर की स्वास्थ्य सेवाएं न मिलने पर बॉम्बे उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने बुधवार को तीव्र नाराजगी व्यक्त की। इस मामले का अदालत ने खुद संज्ञान लेते हुए इसे जनहित याचिका (पीआईएल) के रूप में स्वीकार किया है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल हलफनामे (प्रतिज्ञापत्र) दाखिल करने से काम नहीं चलेगा बल्कि समस्याओं के समाधान के लिए ठोस निर्णय लेना आवश्यक है। विशेष रूप से खाली पदों को भरना सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय होना चाहिए, यह मौखिक टिप्पणी अदालत ने की।
न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति राजेश वाकोडे की खंडपीठ के समक्ष हुई सुनवाई में यह बात सामने आई कि एम्स नागपुर में मंजूर 373 पदों में से करीब 137 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। अदालत ने संज्ञान लिया कि इस कारण मरीजों की सेवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि सही समय पर इलाज न मिलने के कारण कई मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जबकि नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना इस संस्थान की जिम्मेदारी है।
केंद्र की ओर से एडवोकेट मुग्धा चांदुरकर ने पैरवी की। उन्होंने अस्पताल में बिस्तरों की संख्या, मरीजों को दिए जा रहे इलाज की जानकारी और पद भर्ती की वर्तमान स्थिति को अदालत के सामने रखा। इस मामले में एडवोकेट जुगलकिशोर गिल्डा ने 'न्यायालय मित्र' के रूप में बहस की, जबकि एडवोकेट शौनक कोठेकर ने उन्हें सहयोग दिया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने मरीजों को समय पर बेड उपलब्ध होने के मुद्दे पर भी कड़ा रुख अपनाया। खंडपीठ ने कहा कि दूरदराज के इलाकों से इलाज के लिए आने वाले मरीजों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और आवश्यक सुविधाएं प्रदान करना एम्स प्रशासन का कर्तव्य है। इसके लिए आवश्यक निर्णय तुरंत लेकर उस पर अमल करने की आवश्यकता है। अदालत ने एम्स प्रशासन को विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए 2 सप्ताह का समय देते हुए सुनवाई स्थगित कर दी।