नागपुर: धर्म परिवर्तन व आरक्षण को जोड़ने वाली PIL पर HC ने कहा- यह जनहित नहीं, निजी या प्रचार हित की याचिका है
Bombay High Court: नागपुर में दायर जनहित याचिका को HC ने खारिज करते हुए कहा कि यह जनहित नहीं, बल्कि निजी या प्रचार हित से प्रेरित है। याचिका में धर्म परिवर्तन और एससी दर्जे को जोड़ने की मांग की गई थी।
- Written By: अंकिता पटेल
नागपुर में दायर जनहित याचिका को हाई कोर्ट ने खारिज,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Nagpur Bench Religious Conversion: नागपुर जिले में भले ही किसी के पास पुराना अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र हो, लेकिन इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाए जाने के बाद उन्हें महाराष्ट्र में चुनावी पदों के आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति का नहीं माना जाना चाहिए, इन दलीलों के साथ परिमल कांबले की ओर से हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई।
महाराष्ट्र में चुनाव लड़ने के परिवर्तन से जुड़े इस मामले पर सुनवाई के बाद न्या। अनिल किलोर और न्या। राज वाकोडे ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट रूप से इसे ‘जनहित’ के बजाय ‘निजी या प्रचार हित’ से प्रेरित याचिका करार दिया।
याचिका में मांग की गई थी कि राज्य सरकार अंतर-धार्मिक विवाहों के अनिवार्य पंजीकरण के लिए नियम बनाए, जिसमें प्रत्येक पक्ष द्वारा अपने धर्म की स्पष्ट घोषणा की जाए। याचिकाकर्ता का मानना था कि ऐसे रिकॉर्ड्स को इलेक्ट्रॉनिक रूप से जोड़ा जाए ताकि जब भी कोई एससी प्रमाणपत्र धारक इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाए, तो इसकी सूचना अपने आप ‘जाति जांच समितियों’ और चुनाव अधिकारियों को मिल जाए।
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जाति विवादों के लिए पहले से मौजूद है कानून
न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन किया है या नहीं, और क्या वह कानूनी रूप से मान्य है, यह ऐसे विवादित तथ्य है जिनकी जांच साक्ष्य के आधार पर सक्षम वैधानिक अधिकारियों द्वारा ही की जा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवारों की जाति की स्थिति को सत्यापित करने के लिए महाराष्ट्र जाति प्रमाणपत्र (जारी करने और सत्यापन का विनियमन) अधिनियम, 2000′ के रूप में एक संपूर्ण वैधानिक तंत्र पहले से मौजूद है। हाई कोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र को आरक्षित श्रेणी से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की चुनावी पात्रता की सामान्य जांच करने का मंच नहीं बनाया जा सकता।
राजनीतिक से प्रेरित है याचिकाकर्ता का उद्देश्य
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिका को भले ही जनहित याचिका का नाम दिया गया हो, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य अकौला मनपा चुनाव में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने वाली एक उम्मीदवार (प्रतिवादी नंबर 7) को निशाना बनाना था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि उक्त महिला सामाजिक और वैवाहिक मामलों में खुद को मुस्लिम बताती है।
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लेकिन चुनाव लड़ने के लिए खुद को हिंदू एससी के रूप में पेश करती है। हाई कोर्ट ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए कहा कि यदि याचिकाकर्ता को किसी उम्मीदवार के चुनाव से कोई व्यक्तिगत शिकायत है, तो उसे सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उपलब्ध वैधानिक कानूनी विकल्पों का उपयोग करना चाहिए न कि जनहित याचिका का।
