

Nagpur Municipal Commissioner: नागपुर केंद्र और राज्य सरकार की एनयूएचएम योजना के तहत महानगर पालिका की ओर से स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा रही हैं, जिसमें 90 से अधिक नसों की नियुक्ति की गई। वर्ष 2005 से लेकर 2024 तक सेवाएं देने के बावजूद उनकी जगह 52 नए पदों पर नियुक्ति के लिए मनपा की ओर से विज्ञापन जारी किए गए।
इसे लेकर धरती मोरे और अन्य 47 नर्सों की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट के आदेश का पालन नहीं होने का मामला उजागर होते ही अदालत ने मनपा आयुक्त के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर जवाव दायर करने के आदेश दिए।
मनपा को कड़ी फटकार लगाते हुए कोर्ट का मानना था कि गत समय ही मनपा को स्पष्ट आदेश दिए गए थे लेकिन अब आचार संहिता का बहाना किया जा रहा है। आचार संहिता भले ही रही हो, लेकिन हाई कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे। ऐसे में उसका पालन होना चाहिए था। याचिकाकर्ता की ओर से अधि। रवि सन्याल ने पैरवी की।
हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाली जनरल मिडवाइफरी नसों के नियमितीकरण को लेकर महानगर पालिका को यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या वह इन नसों की सेवाओं को नियमित करने के लिए कोई नीति बनाने का इरादा रखती है।
नागपुर मनपा का इस मामले में तर्क था कि इन नर्सों को नियमितीकरण के लिए इसलिए नहीं विचार किया गया क्योंकि वे मनपा के नियमित ढांचे में नहीं, बल्कि एक विशेष योजना के तहत काम कर रही हैं। हालांकि सुनवाई के दौरान यह बात साबित हुई कि इस योजना को लागू करने का जिम्मा मनपा का ही है और इन नर्सों की नियुक्तियां भी मनपा ने ही की हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मनपा को सख्त हिदायत दी थी कि यदि उसने न्यायालय के पुराने निर्देशों के तहत जल्द निर्णय नहीं लिया, तो उसके खिलाफ न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। गत सुनवाई के दौरान मनपा की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत के समक्ष 30 अप्रैल 2026 को एक आधिकारिक सूचना प्रस्तुत की थी। उन्होंने अदालत को जानकारी दी थी कि मई 2026 में मनपा की एक आम सभा होने जा रही है।
अधिवक्ता ने आश्वासन दिया था कि इस बैठक में न्यायालय द्वारा 5 जनवरी 2026 को पारित किए गए आदेश के निर्देशों के अनुसार अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। मनपा के इस आश्वासन को रिकॉर्ड घर लेते हुए हाई कोर्ट ने सुनवाई स्थगित की थी।
हालांकि अदालत ने मनया को दिलाई न बरतने की चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया था कि यदि वह इस मुद्दे पर निर्णय लेने और अदालत को अपनी अनुपालन रिपोर्ट सौंपने में विफल रहता है, तो न्यायालय सीधे तौर पर अवमानना अधिनियम के प्रावधानों के तहत कार्रवाई आगे बढ़ाएगा।