अस्पतालों में स्ट्रेचर-व्हीलचेयर तो हैं, पर चलाने वाले गायब! खुद स्ट्रेचर खींचने को मजबूर मरीजों के परिजन

Nagpur Government Hospitals: सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्थिति पर हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया है। कर्मचारियों की कमी के कारण मरीजों के परिजनों को खुद स्ट्रेचर और व्हीलचेयर संभालनी पड़ रही है।
Hospitals have stretchers and wheelchairs, but the operators are nowhere to be found! Patients' relatives are forced to pull the stretchers themselves.
सरकारी अस्पताल, स्वास्थ्य व्यवस्था,(सोर्स: सोशल मीडिया)
Published on: 
Updated on: 

Nagpur Government Hospitals Staff Shortage: नागपुर राज्य भर के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं की दयनीय स्थिति को लेकर समाचार पत्र में छपी खबर पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सोमवार को न्यायाधीश अनिल किलोर और न्यायाधीश राज वाकोडे ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार कर लिया। साथ ही इसे याचिका के रूप में अदालत के समक्ष प्रेषित करने के लिए अधि। ईशा ठाकुर की अदालत मित्र के रूप में नियुक्ति भी की। समाचार रिपोर्ट ने राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली की पोल खोल दी है।

इस रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि राज्य भर के अधिकांश सरकारी अस्पतालों में मरीजों के रिश्तेदारों को खुद ही स्ट्रेचर खींचने और व्हीलचेयर धकेलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के ओपीडी और आपातकालीन वार्ड में स्ट्रेचर और व्हीलचेयर की कोई कमी नहीं है और वे पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं। हालांकि परिचारकों और सहायक कर्मचारियों की भारी कमी के कारण मरीजों के परिजनों को मजबूर होकर खुद स्ट्रेचर और व्हीलचेयर घसीटना पड़ता है।

कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ता है मरीज

समाचार पत्र में छपी खबर के अनुसार राज्य के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खुल गई है। संपूर्ण राज्य के शासकीय अस्पतालों में वॉर्ड ब्वॉय और कर्मचारियों की भारी कमी के कारण मरीजों के परिजनों को ही स्ट्रेचर और कीलचेयर खींचने पड़ रहे हैं। कई अस्पतालों में तो हालात इतने बदत्तर हैं कि स्ट्रेचर न मिलने पर बेबस परिजनों को मरीजों को अपने कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ रहा है और एंबुलेंस सेवाओं का भी बुरा हाल है। सरकारी अस्पताल की स्थिति का आलम यह है कि कहीं पर 'बेड का अकाल' पड़ा हुआ है और बेड उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को जमीन पर लिटाकर इलाज किया जा रहा है। एक उदाहरण देते हुए बताया गया कि अस्पताल में एक पैर में फ्रैक्चर वाली महिला को इलाज के बाद स्ट्रेचर या एंबुलेंस न मिलने के कारण परिजनों को दोपहिया वाहन पर बैठाकर ले जाना पड़ा, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की अमानवीय सच्चाई को उजागर करता है।

करोड़ों के अस्पताल, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का संकट बरकरार

पुणे और मुंबई जैसे शहरों में करोड़ों रुपये खर्च करके चकाचक अस्पताल तो बना दिए गए हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अकाल है। 700 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद परिजनों को खुद ही मरीजों को लेकर इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। मुंबई के सबसे बड़े अस्पतालों सायन, केईएम, नायर और जेजे अस्पताल में मरीजों की भारी भीड़ होती है।

यहां वॉर्ड ब्वॉय और हेल्पर की कमी के कारण परिजन स्ट्रेचर ढूंढने से लेकर मरीजों को वॉर्ड तक पहुंचाने का काम खुद करने को विवश हैं। गड़चिरोली में महिलाओं को सोनोग्राफी और अन्य जांचों के लिए परिजनों द्वारा कंधों पर या हाथों में उठाकर ले जाना पड़ रहा है। गोंदिया, सोलापुर और बुलढाणा के कई जिलों के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में एंबुलेंस, स्ट्रेचर, व्हीलचेयर और कर्मचारियों की भारी कमी है, जिससे मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com