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नागपुर की दीक्षाभूमि पर उमड़ा जनसैलाब, बौद्ध अनुयायियों ने आंबेडकर को किया नमन
Nagpur News: नागपुर दीक्षाभूमि पर धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर लाखों अनुयायी पहुंचे। डॉ. आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्म अंगीकरण की याद में सुरक्षा के बीच श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा है।
- Written By: आकाश मसने

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि (सोर्स: IANS)
Dhamma Chakra Parivartan Divas: भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने 1956 में विजयदशमी के दिन ही हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकारा था। गुरुवार को उनके 69वें धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस पर देशभर से बौद्ध अनुयायी इस उत्सव को मनाने के लिए नागपुर में बौद्ध धर्म के प्रमुख केंद्र ‘दीक्षाभूमि’ में एकत्र हुए हैं।
इस वर्ष दीक्षाभूमि पर भीम अनुयायियों की संख्या में भारी वृद्धि देखी जा रही है। पिछले वर्षों की तुलना में इस बार भीड़ ने सभी रिकॉर्ड तोड़ने की संभावना है। सुबह से ही दीक्षाभूमि पर अनुयायियों का सैलाब उमड़ रहा है।
सुबह से ही दीक्षाभूमि पर श्रद्धालुओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। इसे देखते हुए नागपुर पुलिस ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी किए हैं। सड़कों पर बैरिकेड्स, सीसीटीवी कैमरे और अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए हैं ताकि किसी भी तरह की असुविधा न हो।
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आंबेडकर और भगवान बुद्ध के विचार ही दिखा सकते हैं रास्ता
दीक्षाभूमि पर मौजूद अनुयायियों ने बाबासाहेब के विचारों को आज की वैश्विक और राष्ट्रीय चुनौतियों का समाधान बताया। अनुयायियों का कहना है कि आज जब विश्व में शांति की जरूरत है और कई देश युद्ध की स्थिति से जूझ रहे हैं, ऐसे में डॉ. आंबेडकर और भगवान बुद्ध के विचार ही रास्ता दिखा सकते हैं।
1990 से बाबासाहेब के विचारों का अनुसरण कर रहे अनुयायी ने कहा कि मैंने 2005 में दीक्षाभूमि पर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बाबासाहेब ने कहा था कि मैं भले ही हिंदू धर्म में पैदा हुआ, लेकिन इसमें मरूंगा नहीं। सम्राट अशोक ने भी दशहरे के दिन बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी और उसी को आगे बढ़ाते हुए बाबासाहेब ने दीक्षा ली थी। आज के दिन विश्व भर से लोग इसलिए आते हैं ताकि लोग बाबासाहेब के बताए गए मार्ग पर चलें।
क्या बोले दीक्षाभूमि पहुंचे अनुयायी?
नीलिमा हेमंता पाटिल ने कहा कि बाबासाहेब ने हमारे लिए जो किया, उसके लिए हम उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने दीक्षाभूमि आए हैं। उनके विचार आज भी हमें प्रेरित करते हैं।
वहीं, मानसी ने बाबासाहेब को अपनी प्रेरणा बताते हुए कहा, “वह हमारे लिए पूजनीय हैं। उन्होंने कहा था पढ़ो, संगठित हो और संघर्ष करो। आज के समाज को उनके विचारों पर चलना चाहिए। लोगों को बौद्ध धर्म की किताबें पढ़नी चाहिए ताकि उन्हें अपने इतिहास और बाबासाहेब के संघर्ष का पता चले। जब तक हम पढ़ेंगे नहीं, हमें यह नहीं समझ आएगा कि हम कहां से आए हैं और हमें कहां जाना है।”
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मानसी ने कहा, “लोगों को किताबें पढ़नी चाहिए। बौद्ध धर्म की शिक्षाएं और बाबासाहेब की किताबें हमें बताती हैं कि हमें क्या करना चाहिए। जब तक हमें अपने इतिहास और बाबासाहेब के संघर्ष का ज्ञान नहीं होगा, हम आज की चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएंगे।”
अशांति का समाधान बाबासाहेब के विचारों में
विवेक ने वर्तमान परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज देश और दुनिया में जो अशांति और असमानता है, उसका समाधान बाबासाहेब के विचारों और संविधान में है। अगर हम उनके विचारों को अपनाएं तो एक बेहतर समाज और देश की नींव रख सकते हैं।
विजयादशमी का दिन इसलिए भी खास है, क्योंकि ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने इसी दिन बौद्ध धर्म अपनाया था। इसे धम्मक्रांति के रूप में जाना जाता है। उसी प्रेरणा से डॉ. आंबेडकर ने भी विजयादशमी के दिन धर्म परिवर्तन का फैसला लिया था। आज दीक्षाभूमि बाबासाहेब के अनुयायियों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है।
हर साल विजयादशमी पर देशभर से लाखों अनुयायी दीक्षाभूमि पर श्रद्धा और उत्साह के साथ पहुंचते हैं। यह स्थान न केवल बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पवित्र है, बल्कि सामाजिक समानता और शांति के संदेश का भी प्रतीक है।
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