कैसे टूटी शिवसेना? भरत गोगावले ने खोले राज, बताया पार्टी की बर्बादी के पीछे किसका था हाथ
महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ी पार्टियों में से एक मानी जाने वाली पार्टी शिवसेना वर्तमान में दो गुटों में विभाजित हो चुकी है। इस विभाजन के पीछे का असली कारण क्या था? आखिरकार, इस बात का खुलासा हो गया।
- Written By: प्रिया जैस
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे (सौजन्य-एएनआई)
मुंबई: उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास आघाड़ी सरकार के दौरान 20 जून 2022 शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में ऐतिहासिक बगावत हुई थी। तब शिवसेना के 40 विधायक और 13 सांसद उद्धव को छोड़कर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बीजेपी नीत महायुति में शामिल हो गए थे। इतना ही नहीं उद्धव से पार्टी का नाम ‘शिवसेना’ और चुनाव चिन्ह धनुष-बाण भी छीन गया था।
महाराष्ट्र पर आए उक्त सियासी संकट के लिए उद्धव गुट और शिंदे गुट की ओर से लगातार आरोप प्रत्यारोप होते रहे रहे हैं। लेकिन उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के मंत्री व नेता भरत गोगावले ने यह कह कर हड़कंप मचा दिया है कि उद्धव की पत्नी रश्मि के कारण शिवसेना टूटी थी।
सबसे ज्यादा इनका हस्तक्षेप
भरतशेठ गोगावले ने पहली बार रश्मि ठाकरे पर हमला बोलते हुए कहा कि वह पार्टी के काम में बहुत ज्यादा हस्तक्षेप करती हैं। उद्धव ठाकरे वैसे तो अच्छे हैं लेकिन स्त्री हठ के आगे वह कुछ कर नहीं पाते हैं। ऐसा कहते हुए गोगावले ने आगे यहां तक कह दिया कि असल में शिवसेना को रश्मि ठाकरे ही चलाती हैं।
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राणे, राज, भुजबल करनेवाले थे घर वापसी
उद्धव और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे के फिर से साथ आने की अटकलों की पृष्ठभूमि में भी गोगावले ने कहा कि राज ही नहीं बल्कि नारायण राणे और छगन भुजबल भी शिवसेना में घर वापसी करनेवाले थे। 2014 में ऐसे प्रयास किए गए थे। तब बीजेपी में जाने से पहले राणे, शिवसेना में आने की तैयारी कर रहे थे लेकिन उस समय किसी ने उद्धव के कान में कुछ कहा और पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
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शिंदे और उद्धव में बताया अंतर
गोगावले ने कहा कि उद्धव से मिलने आए विधायक व कार्यकर्ताओं को घंटों बैठा दिया जाता था। इसलिए शिकायत थी कि अगर विधायक का काम नहीं हो रहा है, तो कार्यकर्ताओं की कौन सुनेगा? उन्होंने आरोप लगाया कि रश्मि के दबाव में उद्धव ने अपने विधायक पुत्र आदित्य को कैबिनेट मंत्री बनी बनाया था। जबकि हम लोगों ने एकनाथ शिंदे से कहा था कि श्रीकांत शिंदे को मंत्री पद दीजिए। लेकिन उन्होंने हमारा प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
