MVA Split Saamana Editorial (फोटो क्रेडिट-X)
MVA Split Saamana News: महाराष्ट्र की राजनीति में महाविकास अघाड़ी (MVA) के भीतर दरारें अब सरेआम दिखने लगी हैं। शिवसेना (UBT) के मुखपत्र ‘सामना’ के ताजा संपादकीय में कांग्रेस के खिलाफ बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कांग्रेस को ‘कुढ़ने वाला’ और ‘मतलबी’ करार देते हुए सलाह दी है कि वह क्षेत्रीय दलों को केवल अपनी ‘सहयोगी बैसाखी’ न समझे। यह कड़वाहट मुख्य रूप से बारामती विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस द्वारा सुनेत्रा पवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारने के फैसले के बाद पैदा हुई है।
दरअसल, शरद पवार और उद्धव ठाकरे के गुट इस पक्ष में थे कि अजित पवार के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर सुनेत्रा पवार को निर्विरोध जीत दिलाई जाए। इसके विपरीत, कांग्रेस ने आकाश विजय राव मोरे को चुनावी मैदान में उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है। सामना में लिखा गया है कि कांग्रेस का यह फैसला गठबंधन की भावना के खिलाफ है और क्षेत्रीय नेतृत्व की ‘खींचतान’ का नतीजा है।
संपादकीय में महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल पर सीधा कटाक्ष किया गया है। सपकाल ने हाल ही में विधान परिषद चुनावों को लेकर कहा था कि कांग्रेस गठबंधन में दूसरे नंबर की पार्टी है, इसलिए चर्चा होनी चाहिए। इस पर सामना ने पलटवार करते हुए पूछा कि ‘कांग्रेस में आखिर चर्चा किससे होनी चाहिए?’ लेख में याद दिलाया गया कि राज्यसभा चुनाव के समय भी प्रदेश नेतृत्व कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं था और अंततः उन्हें हाईकमान के आदेश पर शरद पवार का समर्थन करना पड़ा था।
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उद्धव गुट ने कांग्रेस को आईना दिखाते हुए लिखा कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली 100 सीटों और राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष बनने में महाराष्ट्र की 30 सीटों (MVA द्वारा जीती गई) का बड़ा योगदान है। इसमें कांग्रेस की अपनी 13 सीटें भी शामिल हैं। सामना के अनुसार, कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि जब वह क्षेत्रीय दलों को महत्व देती है, तभी उसे सफलता मिलती है। लेख में चेतावनी दी गई कि 13 सीटों की सफलता के कारण विधानसभा चुनाव में की गई ‘जरूरत से ज्यादा खींचतान’ का खामियाजा पूरे गठबंधन को भुगतना पड़ा है।
शिवसेना (UBT) ने स्पष्ट किया कि वे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का साथ देने को तैयार हैं, लेकिन राज्य स्तर पर उन्हें ‘समान भागीदार’ के रूप में सम्मान मिलना चाहिए। संपादकीय में क्षेत्रीय दलों को स्थानीय मुद्दों का ‘लाउडस्पीकर’ बताया गया है। केंद्र की सत्ता की चाह रखने वाली कांग्रेस को नसीहत दी गई है कि वह क्षेत्रीय दलों के अवसरों को ‘लालची नजरों’ से न देखे। बारामती और राहुरी उपचुनावों को लेकर उपजा यह विवाद संकेत दे रहा है कि आगामी निकाय चुनावों और भविष्य की राजनीति में MVA की राहें जुदा हो सकती हैं।