Muslim Reservation Bombay High Court (फोटो क्रेडिट-X)
Muslim Quota: महाराष्ट्र सरकार द्वारा मुस्लिम समुदाय को मिलने वाले 5 प्रतिशत आरक्षण को रद्द करने के हालिया फैसले ने एक नया कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। राज्य सरकार ने मंगलवार, 17 फरवरी 2026 को एक सरकारी प्रस्ताव (GR) जारी कर सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम समुदाय के लिए तय इस कोटे को समाप्त कर दिया। इस फैसले को अब बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसमें सरकार के इस कदम को असंवैधानिक और सांप्रदायिक रूप से प्रेरित बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह निर्णय न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि एक बड़े समुदाय को विकास की मुख्यधारा से पीछे धकेलने वाला है।
यह विवाद साल 2014 से चला आ रहा है, जब तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने एक अध्यादेश के जरिए मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय को ‘विशेष पिछड़ा वर्ग’ श्रेणी के तहत 5 प्रतिशत आरक्षण दिया था। हालांकि, बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने मराठा आरक्षण पर रोक लगा दी थी, लेकिन शैक्षणिक संस्थानों में मुस्लिम आरक्षण को आंशिक रूप से बरकरार रखा था। वर्तमान महायुति सरकार के इस नए जीआर ने उस कानूनी राहत को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया है, जिससे अब कानूनी लड़ाई और तेज हो गई है।
अधिवक्ता डॉ. सैयद एजाज अब्बास नकवी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में सिविल रिट याचिका (नंबर 5063/2026) दायर कर 17 फरवरी के सरकारी आदेश (GR 181) को रद्द करने की मांग की है। याचिकाकर्ता की ओर से वकील नितिन सातपुते पैरवी कर रहे हैं। याचिका में अदालत से अपील की गई है कि इस ‘सांप्रदायिक’ और ‘अनुचित’ कदम पर तत्काल रोक लगाई जाए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए, याचिका को 23 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति रियाज छागला की पीठ के समक्ष तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की संभावना है।
महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस पार्टी ने इसे “लोकतंत्र के लिए घातक” करार देते हुए कहा है कि सरकार जानबूझकर अल्पसंख्यकों को निशाना बना रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) ने भी इस कदम का कड़ा विरोध किया है। विपक्ष का तर्क है कि सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों के आधार पर मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन को स्वीकार किया गया था, ऐसे में बिना किसी ठोस आधार के आरक्षण छीनना सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
2014 में जारी अध्यादेश के बाद से ही मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा कानूनी पेचीदगियों में फंसा रहा है। जब यह मामला पहले हाई कोर्ट पहुँचा था, तब अदालत ने नौकरियों में आरक्षण को तो हरी झंडी नहीं दी थी, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में 5 प्रतिशत कोटे को उचित ठहराया था। इसके बावजूद, बाद की सरकारों ने इसे कानूनी रूप देने में सक्रियता नहीं दिखाई। अब, 2026 में जारी नए जीआर ने रही-सही संभावनाओं को भी खत्म करने का प्रयास किया है, जिसे याचिकाकर्ता ने सीधे तौर पर कोर्ट में चुनौती दी है। अब सबकी निगाहें 23 फरवरी को होने वाली कोर्ट की कार्यवाही पर टिकी हैं।