‘सफेद पट्टी पोतने वालों का मुँह काला कर देंगे’; मुंबई के सफेद लाइन विवाद पर मैदान में उतरे राज ठाकरे के सैनिक
Ghatkopar White Line Dispute: मुंबई के घाटकोपर में जैन भिक्षुओं के लिए खींची गई सफेद लाइन पर मनसे ने आक्रामक रुख अपना लिया है। इसे कल्चरल टेररिज्म बताते हुए कालिख पोतने की चेतावनी दी है।
- Written By: गोरक्ष पोफली
मुंबई सफेद लाइन विवाद और राज ठाकरे (सोर्स: डिजाइन फोटो)
Mumbai White Line Controversy MNS: मुंबई के घाटकोपर में जैन भिक्षुओं के लिए खींची गई एक ‘सफेद लाइन’ ने अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले लिया है। इस मामले में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने अत्यंत आक्रामक रुख अपनाते हुए स्थानीय प्रशासन और सत्ताधारियों पर तीखा प्रहार किया है। मनसे नेता संदीप देशपांडे ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर मुंबई की अस्मिता और गुजराती प्रभाव से जोड़ते हुए विवाद को नई दिशा दे दी है।
मनसे की तीखी प्रतिक्रिया और प्राथमिक मुद्दा
मनसे के फायरब्रांड नेता संदीप देशपांडे ने इस घटना के संदर्भ में चेतावनी दी है कि जो लोग सफेद लाइन पेंट कर कल्चरल टेररिज्म फैलाने की कोशिश करेंगे, भविष्य में उनके चेहरे पर कालिख पोत दी जाएगी। मनसे का यह बयान उस व्यापक असंतोष को दर्शाता है, जहाँ पार्टी का मानना है कि मुंबई की साझा संस्कृति और सार्वजनिक स्थानों पर एक विशेष समुदाय की मान्यताओं को थोपा जा रहा है। संदीप देशपांडे की यह टिप्पणी इस मुद्दे को ‘मराठी बनाम अन्य’ के दृष्टिकोण से पेश करती है, जो मनसे की राजनीति का एक प्रमुख हिस्सा रहा है।
पांढऱ्या पट्ट्या मारून सांस्कृतिक दहशतवाद परसवण्याचा प्रयत्न करणाऱ्यांची या पुढे तोंड काळी करण्यात येतील. — Sandeep Deshpande (@SandeepDadarMNS) June 10, 2026
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क्या है सफेद लाइन का पूरा विवाद?
यह पूरा विवाद पूर्वी मुंबई के घाटकोपर स्थित ‘कैलास एवेन्यू’ हाउसिंग सोसाइटी से शुरू हुआ। सोसाइटी के कॉमन एरिया में सड़क से लेकर बिल्डिंग की सीढ़ियों तक एक चौड़ी सफेद पट्टी पेंट की गई थी। यह पट्टी इसलिए बनाई गई थी ताकि जैन भिक्षु वर्षा ऋतु के दौरान भिक्षा लेने के लिए सोसाइटी के भीतर आ सकें। जैन भिक्षु अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हैं। मानसून के दौरान जमीन पर काई जम जाती है, जिसमें सूक्ष्म जीव होते हैं। भिक्षु उन सूक्ष्म जीवों पर पैर रखने से बचने के लिए काई वाली जगह पर नहीं चलते। इसलिए, उनके चलने के लिए एक साफ रास्ता बनाने के उद्देश्य से यह पट्टी खींची गई थी।
सोसाइटी में विरोध और विवाद की वजह
सोसाइटी के एक निवासी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर प्रसाद वेदपाठक ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। प्रसाद का तर्क है कि हाउसिंग सोसाइटी का परिसर सभी निवासियों का साझा स्थान है और इसमें किसी भी तरह के धार्मिक निशान लगाना गलत है। उन्होंने सवाल उठाया कि वे महाराष्ट्र के मूल निवासी हैं और उनके यहाँ ‘गोंधल’ जैसी धार्मिक प्रथाएं होती हैं, जिनमें पशु बलि की परंपरा रही है। उन्होंने पूछा कि क्या वे भी सोसाइटी परिसर के भीतर ऐसी प्रथाएं शुरू कर सकते हैं?
प्रसाद के अनुसार, ऐसी गतिविधियां निवासियों के बीच विभाजन पैदा करती हैं और साझा आवासीय स्थान की तटस्थता को खत्म करती हैं। उन्होंने सोसाइटी कमेटी को औपचारिक पत्र लिखकर इन निशानों को तुरंत हटाने की मांग की है।
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सफेद पट्टी विवाद की वर्तमान स्थिति
जहाँ एक ओर जैन समुदाय के सदस्यों का कहना है कि यह केवल एक साधारण लाइन थी और इससे किसी को ठेस नहीं पहुँचनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर मनसे जैसे राजनीतिक दलों ने इसे मराठी अस्मिता और मुंबई के स्थानीय अधिकारों के मुद्दे के रूप में तूल दे दिया है। फिलहाल, इस मामले ने मुंबई में ‘साझा स्थानों के उपयोग’ और ‘विभिन्न समुदायों की धार्मिक प्रथाओं’ के बीच के संतुलन पर एक नई बहस छेड़ दी है। न्यायालय और प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद ही इस विवाद का अंतिम समाधान संभव नजर आ रहा है।
