

Mumbai Landslide Special Story OnAction Plan: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मानसून के दौरान भूस्खलन से होने वाली जनहानि और आर्थिक तबाही कोई नई बात नहीं है। 12 अगस्त 2026 बुधवार को कुर्ला पश्चिम के अशोक नगर स्थित टेकडी क्रमांक-3 में बुधवार तड़के हुए भूस्खलन की दर्दनाक घटना में करीब 8 लोगों की मौत हो गई, जबकि 7 लोग घायल हुए हैं। मृतकों में दो बच्चे भी शामिल हैं। हिमालय सोसायटी के पास गौसिया पहाड़ी का मलबा और मिट्टी 8 से 10 घरों पर गिरने से यह हादसा हुआ। हादसे के बाद घटनास्थल पर बड़े पैमाने पर बचाव एवं राहत कार्य शुरू किया गया। पिछले 34 सालों में 340 मौतें मुंबई में भूस्खलन की वजह से हुई है मतलब औसतन हर मानसून 10 मौत।
सूचना के अधिकार (RTI) से सामने आए आंकड़ों ने सरकारी कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संवेदनहीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुंबई के पहाड़ी इलाकों में बसे 22,483 परिवार पिछले 15 वर्षों से लगातार 'मौत के साए' में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। पिछले 34 वर्षों में भूस्खलन की घटनाओं में 340 निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 300 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली द्वारा प्राप्त जानकारियों के अनुसार, मुंबई के 36 में से 25 विधानसभा क्षेत्रों में स्थित 257 स्थानों को अति-संवेदनशील और खतरनाक पहाड़ी क्षेत्रों की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
मुंबई स्लम इम्प्रूवमेंट बोर्ड ने 2010 में किए गए एक विस्तृत सर्वेक्षण के आधार पर सिफारिश की थी कि प्राथमिकता के तौर पर 22,483 झोपड़ियों में से 9,657 झोपड़ियों को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया जाए, तथा शेष झोपड़ियों को सुरक्षा दीवार बनाकर सुरक्षित किया जाए। अनिल गलगली ने मानसून के दौरान 327 स्थानों पर भूस्खलन की आशंका जताते हुए सरकार को चेतावनी भी दी थी।
इस पूरी मानवीय त्रासदी का सबसे दुखद पहलू यह है कि वर्ष 2010 की बोर्ड रिपोर्ट और जनहित में दिए गए ज्ञापनों के बाद, तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने 1 सितंबर 2011 को ही नगर विकास विभाग को एक ठोस 'एक्शन टेकिंग प्लान' (ATP) तैयार करने का लिखित आदेश दिया था।
हालांकि, इस आदेश के 15 साल बीत जाने के बाद भी नगर विकास विभाग ने आज तक कोई भी कारगर योजना जमीन पर लागू नहीं की। मुख्यमंत्री के निर्देशों को फाइलों में दबाकर रख दिया गया, जिसके कारण आज भी हजारों परिवार हर बारिश में अपनी जान हथेली पर रखकर रहने को विवश हैं।
यदि 2010-11 में ही पुनर्वास प्रक्रिया शुरू कर दी गई होती, तो पिछले डेढ़ दशक में भूस्खलन के कारण हुई कई मौतों को रोका जा सकता था। नागरिक संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि हर मानसून में हादसों के बाद केवल मुआवजा देने की रस्म अदायगी की जाती है, जबकि मुख्य समस्या के स्थायी समाधान यानी बस्तियों के सुरक्षित पुनर्वास और रिटेनिंग वॉल के निर्माण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।