Mumbai Real Estate: अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा पर सवाल, मुंबई में नीतियां हुईं बेअसर
Budget 2026 से पहले मुंबई में हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। मौजूदा नीतियां और कीमतों की हकीकत मेल नहीं खा रही, जिससे मिडिल क्लास के लिए घर खरीदना और मुश्किल हो गया है।
- Written By: अपूर्वा नायक
मुंबई प्रॉपर्टी मार्केट (सौ. सोशल मीडिया )
Real Estate Sector In Mumbai: मुंबई में अपने घर का सपना अब सिर्फ कम आय वालों का नहीं, बल्कि स्थिर आमदनी वाले मध्यम वर्ग के लिए भी मुश्किल होता जा रहा है। बजट 2026 के साथ हाउसिंग अफोर्डेबिलिटी एक बार फिर नीति-निर्माताओं के लिए बड़ा सवाल बनकर उभरी है।
जमीनी हकीकत यह है कि मौजूदा नीतियां महानगर की रियल एस्टेट सच्चाई से मेल नहीं खा रहीं। सबसे बड़ी दिक्कत “अफोर्डेबल हाउसिंग” की परिभाषा को लेकर है। केंद्र सरकार के मौजूदा मानकों के अनुसार करीब 45 लाख रुपये तक की कीमत वाले घर को अफोर्डेबल माना जाता है।
लेकिन मुंबई और मुंबई महानगर क्षेत्र में इस रकम में बुनियादी सुविधाओं वाला घर मिलना लगभग नामुमकिन है। नतीजतन, बड़ी संख्या में वास्तविक खरीदार उन योजनाओं और कर छूट से बाहर रह जाते हैं, जो उनके लिए बनाई गई हैं।
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मिडिल क्लास दबाव में, रियल एस्टेट में आई सुस्ती
होमबायर्स का कहना है कि मुंबई जैसे महंगे बाजार के लिए अफोर्डेबल हाउसिंग की सीमा कम से कम 80 से 90 लाख रुपये होनी चाहिए। इससे ज्यादा लोग टैक्स इंसेंटिव और अन्य लाभों के दायरे में आएंगे और घर खरीदना कुछ हद तक संभव हो सकेगा। दूसरी बड़ी चुनौती होम लोन का बोझ है।
ऊंची प्रॉपर्टी कीमतों के कारण खरीदारों को बड़े कर्ज लेने पड़ते हैं। सालाना ब्याज भुगतान 4 से 6 लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि स्वयं उपयोग के मकान पर ब्याज में टैक्स छूट की सीमा सिर्फ 2 लाख रुपये है। यह राहत वास्तविक खर्च का छोटा सा हिस्सा ही कवर कर पाती है। यदि इस सीमा को बढ़ाया जाता है, तो ईएमआई का दबाव कम हो सकता है। सरकारी योजनाओं का असर भी मुंबई में सीमित रहा है।
निर्माण की लागतें भी कीमतों को ऊपर धकेल रही
पीएमएवाई-अर्बन जैसी योजनाओं ने छोटे शहरों में मदद जरूर की, लेकिन आय सीमा और सब्सिडी ढांचा मुंबई के दामों से मेल नहीं खाता। मेट्रो शहरों के लिए अलग मॉडल अपनाने की जरूरत है। इस बीच, किराये का बाजार भी दबाव में है।
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घर खरीदना कठिन होने से किराये पर निर्भर आबादी बढ़ी है, लेकिन बढ़ते किराये और सीमित सुरक्षा ने चिंता बढ़ा दी है। संगठित रेंटल हाउसिंग पॉलिसी से संतुलन बन सकता है। निर्माण लागत भी कीमतों को ऊपर धकेल रही है। अंडर-कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी पर 18% जीएसटी का बोझ अंततः खरीदार पर ही पड़ता है।
