महाराष्ट्र की त्रिभाषा नीति पर विवाद गहराया, समिति ने कक्षा 1 से हिंदी अनिवार्य प्रस्ताव को नहीं दिया समर्थन
Maharashtra Government की त्रिभाषा नीति पर बनी समिति की रिपोर्ट में पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य करने के प्रस्ताव को समर्थन नहीं मिला है। रिपोर्ट कैबिनेट में पेश होने से पहले ही चर्चा तेज हो गई है।
- Written By: अपूर्वा नायक
मुंबई न्यूज (सौ. सोशल मीडिया )
Maharashtra Trilingual Policy: महाराष्ट्र सरकार की त्रिभाषा नीति को लेकर गठित विशेष समिति की रिपोर्ट ने राज्य की शिक्षा और राजनीति दोनों में नई चर्चा छेड़ दी है।
सूत्रों के अनुसार डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता वाली समिति ने पहली कक्षा से हिंदी अनिवार्य करने के प्रस्ताव को समर्थन नहीं दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस विचार को व्यापक सहमति नहीं मिली।
कैबिनेट फैसले पर टिकी सबकी नजरें
बताया जा रहा है कि यह रिपोर्ट संभावित कैबिनेट बैठक में पेश की जा सकती है। इसके बाद सरकार अंतिम निर्णय लेगी कि त्रिभाषा नीति में क्या बदलाव किए जाएं। शिक्षा जगत, अभिभावकों और राजनीतिक दलों की नजरें अब सरकार के रुख पर टिकी हुई हैं, क्योंकि यह फैसला राज्य की भाषा नीति को सीधे प्रभावित करेगा।
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सरकार का प्रस्ताव और राजनीतिक विरोध
सरकार की ओर से पहले जारी जीआर में मराठी और अंग्रेजी के साथ तीसरी भाषा के रूप में हिंदी को पहली कक्षा से अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि इस प्रस्ताव का कई राजनीतिक दलों और मराठी संगठनों ने विरोध किया। शिवसेना (यूबीटी), मनसे और मराठी अभ्यासकों ने इसे क्षेत्रीय भाषा और शिक्षा व्यवस्था पर असर डालने वाला कदम बताया था।
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शिक्षा और भाषा संतुलन पर उठे सवाल
समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब भाषा संतुलन, शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई नीति को लागू करने से पहले व्यापक संवाद और सहमति जरूरी है। अब देखना होगा कि सरकार समिति की सिफारिशों को कितना महत्व देती है और भविष्य की भाषा नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
