महाराष्ट्र की 20 जिला परिषदों के चुनाव पर सस्पेंस बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने मानसून के बाद तक टाली सुनवाई
20 Zilla Parishad Elections: महाराष्ट्र की 20 जिला परिषदों और पंचायत समितियों के चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। ओबीसी आरक्षण के कारण रुकी सुनवाई अब मानसून के बाद होगी। जानें क्या है पूरा मामला?
- Written By: गोरक्ष पोफली
सुप्रीम कोर्ट (सोर्स: सोशल मीडिया)
Maharashtra 20 Zilla Parishad Election: महाराष्ट्र में स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं, विशेषकर 20 जिला परिषदों और पंचायत समितियों के बहुप्रतीक्षित चुनावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट से बड़ी खबर सामने आई है। सोमवार को हुई महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान देश की शीर्ष अदालत ने इस मामले को फिलहाल के लिए टाल दिया है। अदालत के इस रुख के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव की तारीखों का इंतजार कर रहे राजनीतिक दलों, इच्छुक उम्मीदवारों और जनता को अभी मानसून के बीतने तक प्रतीक्षा करनी होगी।
ओबीसी आरक्षण का पेंच और सुनवाई में देरी
महाराष्ट्र में 20 जिला परिषदों के चुनाव लंबे समय से रुके हुए हैं, जिसका मुख्य कारण अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का पेचीदा मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट में इस विषय पर विस्तृत चर्चा हुई, लेकिन मामले की गंभीरता और कानूनी बारीकियों को देखते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि इस प्रकरण पर अगली सुनवाई अब गर्मियों की छुट्टियों के समाप्त होने के बाद की जाएगी। इसका सीधा तकनीकी अर्थ यह है कि चुनाव प्रक्रिया अब मानसून के दौरान या उसके बाद ही शुरू हो सकेगी।
सस्पेंस में राजनीतिक दल
इस फैसले ने राज्य की स्थानीय राजनीति में सस्पेंस को एक बार फिर चरम पर पहुंचा दिया है। कई राजनीतिक दल पिछले कई महीनों से जमीन पर अपनी तैयारी पुख्ता कर रहे थे। उम्मीदवारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान तेज कर दिया था, लेकिन अब उन्हें अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। कोर्ट के इस फैसले से चुनाव आयोग की तैयारियों पर भी फिलहाल विराम लग गया है।
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पिछले चरण की स्थिति पर एक नजर
गौरतलब है कि महाराष्ट्र में आरक्षण विवाद के बीच ही पहले चरण के चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए जा चुके हैं। इसमें 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों के लिए मतदान हुआ था, जिनके परिणाम 9 फरवरी को घोषित किए गए थे। इसके साथ ही 29 नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के चुनाव भी संपन्न हो चुके हैं। लेकिन बाकी बची 20 जिला परिषदें राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं, जिन पर अब अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
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आगे की राह और जनता की उम्मीदें
अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों के बाद होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट आरक्षण की पेचीदगियों को सुलझाते हुए एक ठोस गाइडलाइन दे सकता है, जिसके बाद ही राज्य चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान करेगा। तब तक ग्रामीण इलाकों में विकास कार्यों और प्रशासनिक निर्णयों पर ‘प्रशासक राज’ का असर देखने को मिल सकता है।
