

Maharashtra Fast Track Courts Report: महाराष्ट्र में नाबालिग बच्चों पर क्रूर अत्याचार और महिलाओं की निर्मम हत्या जैसे जघन्य अपराधों के मामलों में पीडितों को शीघ्र न्याय दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों की मांग अक्सर उठती रही है।
इन अदालतों का उद्देश्य न्याय प्रक्रिया को तेज करना है, लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर नजर आती है। पिछले आठ से दस वर्षों की स्थिति पर नजर डालें तो राज्य की फास्ट ट्रैक अदालतों में डेढ़ लाख से अधिक मामले वर्षों से लंबित पड़े हैं।
सूचना के अधिकार के तहत बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जानकारी में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। इसके अनुसार राज्य की फास्ट ट्रैक अदालतों में दीवानी और आपराधिक प्रकृति के कुल 1 लाख 61 हजार 937 मामले अभी भी लंबित हैं। यह आंकड़ा अगस्त 2025 तक का है और पिछले आठ महीनों में इसमें बढ़ोतरी होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में गंभीर अपराधों की संख्या बढ़ी है और कई बार नागरिक सड़कों पर उतरकर इन मामलों को फास्ट ट्रैक अदालत में भेजने की मांग कर चुके हैं। सरकार ने संज्ञान लेते हुए अनेक मामले इन अदालतों को सौंप, परंतु वहां भी वर्षों तक न्याय नहीं मिला।
फास्ट ट्रैक होने के बावजूद इन अदालतों में मामले अटकने के पीछे कई कारण हैं। न्यायाधीशों की भारी कमी सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। इसके अलावा सुनवाई के दौरान गवाहों का अनुपस्थित रहना और जांच एजेंसियों द्वारा आरोपियों के खिलाफ समय पर आरोपपत्र दाखिल न करना भी न्याय प्रक्रिया को धीमा कर देता है।
फिलहाल राज्य में 11वें वित्त आयोग के तहत 81 और 14वें वित्त आयोग के तहत 21, यानी कुल 102 फास्ट ट्रैक अदालते सक्रिय है। इन अदालतों की कार्यावधि मार्च 2027 तक निर्धारित की गई है।
इन अदालतों के संचालन की एक निश्चित समय सीमा तय होती है, लेकिन जब मामले उस अवधि के बाद भी अनसुलझे रहते हैं, तो विधि व न्याय विभाग के माध्यम से सरकार इनकी अवधि बढ़ाती है और इसके लिए अलग से आर्थिक प्रावधान भी किया जाता है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि केवल फास्ट ट्रैक अदालतें बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके सुचारू संचालन के लिए ठोस संसाधन और इच्छाशक्ति भी जरूरी है।