फडणवीस का तंज, पब्लिसिटी के लिए कुछ भी बोलते हैं श्याम मानव, जस्टिस गवई का किया बचाव
Bageshwar Baba Controversy: जस्टिस भूषण गवई के बागेश्वर धाम जाने पर श्याम मानव ने अंबेडकरवाद का हवाला देकर निशाना साधा, जिस पर देवेंद्र फडणवीस ने करारा पलटवार किया है।
- Written By: गोरक्ष पोफली
देवेंद्र फडणवीस व श्याम मानव (सोर्स: सोशल मीडिया)
Shyam Manav Vs Devendra Fadnavis: महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक गलियारों में एक बार फिर ‘अंधश्रद्धा’ बनाम ‘आस्था’ की बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के रूप में चर्चित जस्टिस भूषण गवई द्वारा मध्य प्रदेश के बागेश्वर धाम जाकर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के दर्शन करने पर श्याम मानव ने तीखा हमला बोला। इस हमले का जवाब देते हुए उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने श्याम मानव की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठा दिए हैं।
अंबेडकर का नाम न लें जस्टिस गवई
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक श्याम मानव ने जस्टिस भूषण गवई की इस यात्रा को ‘अंबेडकरवादी विचारधारा’ के खिलाफ बताया। उन्होंने अमरावती में बयान देते हुए कहा कि भूषण गवई जिस उच्च संवैधानिक पद तक पहुंचे हैं, वह डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की विचारधारा और संविधान की देन है। एक तरफ बाबासाहेब ने तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात की, और दूसरी तरफ जस्टिस गवई एक ‘चमत्कारी’ बाबा के दरबार में माथा टेक रहे हैं। अब उन्हें अपने मुख से बाबासाहेब का नाम लेने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। श्याम मानव ने आरोप लगाया कि धीरेंद्र शास्त्री धर्म के नाम पर अंधश्रद्धा फैलाते हैं और एक न्यायाधीश का वहां जाना समाज में गलत संदेश देता है।
देवेंद्र फडणवीस का पलटवार
श्याम मानव के इस बयान पर भाजपा नेता और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कड़ा ऐतराज जताया है। फडणवीस ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए कहा कि यह तय करने वाले श्याम मानव कौन हैं कि किसे बाबासाहेब का नाम लेना चाहिए और किसे नहीं? क्या वे अब विचारधारा का सर्टिफिकेट बांटेंगे? असल बात यह है कि श्याम मानव को आजकल कोई पूछता नहीं है, इसलिए वे केवल प्रसिद्धि (Publicity) पाने के लिए इस तरह के ऊल-जुलूल बयान देते रहते हैं।
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क्या है पूरा विवाद?
जस्टिस भूषण गवई हाल ही में सपरिवार बागेश्वर धाम पहुंचे थे। वहां से उनकी धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के साथ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। इसके बाद से ही दलित संगठनों और तर्कवादियों के बीच दो फाड़ देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष इसे निजी आस्था बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन मान रहा है। यह विवाद केवल एक मुलाकात तक सीमित नहीं है।
यह महाराष्ट्र की उस वैचारिक लड़ाई का हिस्सा है जहां एक ओर प्रगतिशील और तर्कवादी आंदोलन है, तो दूसरी ओर धार्मिक मान्यताएं। देवेंद्र फडणवीस द्वारा श्याम मानव को “प्रसिद्धि का भूखा” बताना इस संघर्ष को और अधिक व्यक्तिगत और राजनीतिक बना देता है।
