मूंछ मुंडवाकर और नकली दाढ़ी लगाकर ‘इकबाल शेख’ बने थे छगन भुजबल, 40 साल पुराने आंदोलन की कहानी
Chhagan Bhujbal Remembers Belgaum Border Dispute 1986: छगन भुजबल ने 40 साल पहले बेलगाम सीमा आंदोलन के लिए मूंछ मुंडवाकर और नकली दाढ़ी लगाकर 'इकबाल शेख' बनने के संघर्ष को याद किया।
- Written By: अनिल सिंह
छगन भुजबल ने बेलगाम में किया था आंदोलन (फोटो क्रेडिट-इंस्टाग्राम)
Chhagan Bhujbal Unseen Shocking Photo: महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में सीमा विवाद का मुद्दा हमेशा से ही मराठी आत्मसम्मान और न्याय के लिए संघर्ष का एक बड़ा प्रतीक रहा है। साल 1956 में राज्य पुनर्गठन के समय बेलगाम, कारवार, निपानी, खानापुर, बीदर और भालकी जैसे शुद्ध मराठी भाषी क्षेत्रों को प्रशासनिक रूप से कर्नाटक (तत्कालीन मैसूर राज्य) में शामिल कर दिया गया था। तभी से यह सीमा विवाद महाराष्ट्र की जनता के दिलों के दर्द की तरह सुलग रहा है। छगन भुजबल ने गहरा खेद व्यक्त करते हुए कहा कि अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि इतने दशकों और पीढ़ियों के गुजर जाने के बाद भी यह संवेदनशील सीमावर्ती मुद्दा आज तक हल नहीं हो पाया है।
इस आंदोलन की शुरुआत जून 1986 में तब हुई थी, जब कर्नाटक सरकार द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले मराठी भाइयों पर जबरन कन्नड़ भाषा थोपने का प्रयास किया गया था। मराठी भाषी लोगों की आवाज को दबाने के इस दमनकारी प्रयास के खिलाफ शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने एक आक्रामक और व्यापक आंदोलन का शंखनाद किया था।
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खुफिया रणनीति के तहत गोवा के रास्ते बेलगाम में मारी थी एंट्री
कन्नड़ भाषा थोपे जाने के विरोध में जब महाराष्ट्र से हजारों शिवसैनिकों ने सीमा की तरफ कूच करना शुरू किया, तो कर्नाटक सरकार ने राज्य में प्रवेश करने वाले सभी प्रमुख और गुप्त मार्गों को पूरी तरह से सील कर दिया था। इस कड़े पहरे के बीच मराठी आत्मसम्मान की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए छगन भुजबल ने एक अनोखी गुरिल्ला रणनीति तैयार की। अपनी पहचान पूरी तरह छिपाने के लिए उन्होंने अपनी मूंछें साफ करा दीं, कमीज-पैंट पहनी, गले में टाई कसी, चेहरे पर नकली दाढ़ी चिपकाई और हाथ में सिगार थामकर दुबई के रसूखदार कारोबारी ‘इकबाल शेख’ का सटीक वेश बना लिया। उनका यह रूप इतना अचूक था कि मुंबई से गोवा होते हुए बेलगाम पहुंचने के दौरान उनके कई बेहद करीबी लोग और नाके पर खड़ी पुलिस भी उन्हें पहचान नहीं पाई।
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4 जून 1986 की रात को बेलगाम पहुंचकर प्रशासन को किया था स्तब्ध
तमाम सुरक्षा घेरों और खुफिया पुलिस की कड़ी निगरानी को धता बताते हुए छगन भुजबल 4 जून 1986 की रहस्यमयी रात को आखिरकार बेलगाम की धरती पर कदम रखने में कामयाब हो गए। उनके बेलगाम पहुंचते ही अगले ही दिन सैकड़ों स्थानीय शिवसैनिकों ने कर्नाटक सरकार के अत्याचारों और भाषाई तानाशाही के विरुद्ध सड़कों पर उतरकर एक भीषण और अप्रत्याशित विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस अचानक हुए बड़े राजनीतिक हमले ने कर्नाटक के स्थानीय प्रशासन और खुफिया तंत्र को पूरी तरह से स्तब्ध और लाचार कर दिया था। इस उग्र प्रदर्शन के बाद भुजबल को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें धारवाड़ जिला जेल में करीब 16 दिनों तक कड़े पहरे के बीच सरकारी हिरासत में गुजारने पड़े थे।
निष्ठावान शिवसैनिकों के योगदान और संघर्ष की गूंज आज भी है बरकरार
चार दशक पुराने इस ऐतिहासिक आंदोलन को याद करते हुए छगन भुजबल ने अपने उन निष्ठावान साथी शिवसैनिकों को भी विशेष रूप से नमन किया, जिन्होंने जेल और लाठियों की परवाह न करते हुए इस लड़ाई में उनका डटकर साथ दिया था। उन्होंने दगडू सकपाल, बाबा पिंगले, अरविंद तायडे और हेमंत मंडलिक जैसे कई निडर कार्यकर्ताओं के योगदान को याद किया। भुजबल ने अंत में अपनी भावनाओं को शब्द देते हुए लिखा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में मराठी भाइयों के न्यायसंगत अधिकारों के लिए लड़ा गया वह ऐतिहासिक संघर्ष मात्र एक आंदोलन की सूखी कहानी नहीं था, बल्कि वह हमारी मराठी अस्मिता और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक था, जिसकी गूंज भविष्य में भी हमेशा उतनी ही शक्ति से गूंजती रहेगी।
