Maharashtra Budget Session 2026 (फोटो क्रेडिट-X)
Leader of Opposition Post Vacant: महाराष्ट्र के संसदीय इतिहास में आज यानी सोमवार, 23 फरवरी 2026 का दिन एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक घटनाक्रम के साथ दर्ज होने जा रहा है। राज्य में आज से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र में पहली बार ऐसा होगा, जब विधानसभा और विधान परिषद दोनों सदनों में ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) का पद रिक्त रहेगा। मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता और संख्या बल के अभाव के कारण बनी इस स्थिति ने संवैधानिक और लोकतांत्रिक बहस को जन्म दे दिया है। विपक्ष जहाँ इसे ‘लोकतंत्र का गला घोंटना’ बता रहा है, वहीं सरकार इसे तकनीकी और सदन की प्रक्रिया से जुड़ा मामला करार दे रही है।
विधानसभा और 78 सदस्यीय विधान परिषद में महा विकास आघाड़ी (MVA) आवश्यक जादुई आंकड़ा जुटाने में विफल रही है। परिषद में कांग्रेस एमएलसी प्रज्ञा सातव के इस्तीफे के बाद विपक्ष की संख्या और भी कम हो गई, जिससे नेता प्रतिपक्ष के पद पर दावा पेश करना नामुमकिन हो गया। इस राजनीतिक शून्य के बीच बजट सत्र की कार्यवाही हंगामेदार रहने की पूरी संभावना है।
विपक्ष ने दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति को लोकतांत्रिक मानदंडों के लिए एक बड़ा खतरा बताया है। शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत ने इस स्थिति को ‘लोकतंत्र पर कलंक’ करार देते हुए कहा कि सरकार जवाबदेही से बचने के लिए विपक्ष की संवैधानिक भूमिका को जानबूझकर खत्म कर रही है। लोकतांत्रिक ढांचे में नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार की शक्तियों पर अंकुश लगाने और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए अनिवार्य माना जाता है।
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महाराष्ट्र बजट सत्र के पहले दिन सदन में दिवंगत नेता अजित पवार के निधन पर शोक प्रस्ताव पेश किया जाएगा। हालांकि, यह श्रद्धांजलि सभा भी शांतिपूर्ण रहने के आसार कम हैं। विधायक रोहित पवार सहित एमवीए के कई अन्य नेताओं ने अजित पवार की विमान दुर्घटना को लेकर गंभीर संशय जताया है। विपक्ष का आरोप है कि इस दुर्घटना के पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है। विपक्ष इस मुद्दे को सदन में जोर-शोर से उठाने और सरकार को घेरने की रणनीति तैयार कर चुका है।
इस पूरे विवाद पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति पूरी तरह से विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद के सभापति का विशेषाधिकार है। सरकार का रुख है कि जब तक कोई दल या गठबंधन नियमानुसार न्यूनतम संख्या बल सिद्ध नहीं करता, तब तक नियुक्ति संभव नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेता प्रतिपक्ष के बिना सदन की बहस एकतरफा हो सकती है, जो संसदीय प्रणाली के ‘चेक एंड बैलेंस’ सिद्धांत के विपरीत है।