कॉन्सेप्ट फोटो (सोर्स: सोशल मीडिया)
Bombay High Court on Powai Road Encroachment Case: बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के उस तर्क को ‘घोर लापरवाही’ और ‘कमजोर बहाना’ करार दिया, जिसमें निगम ने निजी संपत्ति का हवाला देकर पवई की एक सड़क से अतिक्रमण हटाने में असमर्थता जताई थी। न्यायमूर्ति रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति अभय मंत्री की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि BMC अपने वैधानिक कर्तव्यों से पीछे नहीं हट सकती और अतिक्रमणकारियों को इस तरह “खुश” करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह कड़ा रुख ‘ब्यूमोंट एचएफएसआई स्कूल’ और उसकी प्रधानाध्यापिका कल्याणी पटनायक द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान अपनाया गया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि स्कूल के पास की सड़क पर झुग्गीवासियों ने अवैध कब्जा कर लिया है। हैरान करने वाली बात यह रही कि BMC ने इन अतिक्रमणकारियों को हटाने के बजाय, उन्हें वहां मोबाइल शौचालय और पानी की सुविधाएं उपलब्ध करा दीं।
अदालत ने BMC के उस हलफनामे पर आश्चर्य व्यक्त किया जिसमें कहा गया था कि सड़क भले ही सार्वजनिक उपयोग में है, लेकिन तकनीकी रूप से ‘निजी संपत्ति’ होने के कारण निगम कार्रवाई नहीं कर सकता। पीठ ने कहा कि BMC का यह रुख वाकई चौंकाने वाला है। यह कहना कि आप कार्रवाई नहीं कर सकते, अतिक्रमणकारियों को वह क्षेत्र सौंपने के बराबर है। यह दर्शाता है कि नगर निकाय के पास समस्या से निपटने की इच्छाशक्ति, साहस या साधनों की कमी है।
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने नगर आयुक्त को सीधे आदेश दिया कि वे अगले 10 दिनों के भीतर इस सड़क से अतिक्रमण हटाने की एक ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करें। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह योजना केवल दिखावा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, अदालत ने BMC को सड़क पर अवैध रूप से लगाए गए मोबाइल शौचालयों को 48 घंटे के भीतर हटाने का सख्त निर्देश दिया है।
इस फैसले ने एक बार फिर नागरिक निकायों की जवाबदेही तय की है, खासकर उन मामलों में जहां ‘निजी बनाम सार्वजनिक संपत्ति’ के दावों का उपयोग अतिक्रमण को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।