Bombay High Court Voyeurism प्रतीकात्मक तस्वीर (सोर्स AI)
Bombay High Court Voyeurism: बॉम्बे हाई कोर्ट ने वॉयरिज्म (तांक-झांक) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टीकरण देते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस अमित बोरकर की एकल पीठ ने कहा कि किसी महिला सहकर्मी के शरीर के ऊपरी हिस्से (स्तन) को घूरना निस्संदेह एक “गलत आचरण” और “अनुचित व्यवहार” है, लेकिन इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354-C (अब BNS की धारा 77) के तहत वॉयरिज्म का अपराध नहीं माना जा सकता।
यह फैसला अभिजीत बसवंत निगुडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में आया है, जिसमें कोर्ट ने 2015 में बोरिवली पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि धारा 354-C (वॉयरिज्म) केवल तब लागू होती है जब कोई महिला किसी ‘प्राइवेट एक्ट’ (निजी कृत्य) में शामिल हो। कानून के अनुसार, प्राइवेट एक्ट का अर्थ वैसी स्थिति से है जहाँ महिला को पूर्ण गोपनीयता (Privacy) की उम्मीद होती है, जैसे कि शौचालय का उपयोग करना या निजी स्थान पर होना। कोर्ट ने कहा कि वॉयरिज्म के अपराध के लिए महिला की फोटो/वीडियो लेना या उसकी निजता में घुसपैठ करना अनिवार्य तत्व है, जो इस मामले में मौजूद नहीं था।
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मामले के अनुसार, 2014 में एक महिला ने आरोप लगाया था कि ऑफिस मीटिंग के दौरान आरोपी उसकी आँखों में देखने के बजाय उसके सीने की तरफ घूरता था और अनुचित टिप्पणियाँ करता था। इस पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा, “आरोप केवल इतना है कि वह ऑफिस मीटिंग्स के दौरान घूरता था। यह कार्यस्थल पर एक असहज माहौल पैदा कर सकता है और गलत आचरण हो सकता है, लेकिन यह वॉयरिज्म नहीं है।” कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति (ICC) ने अपनी जांच में आरोपी को पहले ही इन आरोपों से दोषमुक्त कर दिया था।
जस्टिस बोरकर ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर दुर्व्यवहार या अपमान के मामले अलग तरह के कानूनी विवाद हो सकते हैं, लेकिन हर अनुचित शिकायत को सीधे तौर पर वॉयरिज्म जैसे गंभीर आपराधिक मामले में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने माना कि केवल घूरने के आधार पर धारा 354-C के तहत मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।