BMC चुनाव में महायुति की दरार उजागर, 11 वार्डों में भाजपा की हार का ठीकरा शिंदे गुट पर
BMC Elections 2026 में महायुति की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में सामने आया है कि 11 वार्डों में शिंदे गुट के कारण पार्टी को अप्रत्याशित हार झेलनी पड़ी।
- Written By: अपूर्वा नायक
बीएमसी चुनाव 2026 (सोर्सः सोशल मीडिया)
Mumbai News In Hindi: बीएमसी चुनाव को लेकर महायुति में भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) में अंदरूनी कलह तेज होती जा रही है। भाजपा की जांच में पता चला है कि पार्टी की उन 11 वार्ड में हार हुई है, जहां उसे जीत का पक्का भरोसा था।
इन सीटों पर शिंदे गुट की वजह से पराजय हुई है। भाजपा के रिव्यू के मुताबिक 11 वार्डों में पार्टी उम्मीदवार मजबूत स्थिति में थे, लेकिन महायुति में अंदरूनी कलह, स्थानीय स्तर पर तालमेल की कमी और कार्यकर्ताओं के बीच संभ्रम का असर चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में पड़ा।
कहीं उम्मीदवार की अलग-अलग प्लानिंग तो कहीं वोटों के बंटवारे ने भाजपा की जीत का रास्ता रोक दिया। भाजपा नेताओं का कहना है कि दोनों दलों के बीच तालमेल मजबूत बनाने की जरूरत है, नहीं तो भविष्य के चुनावों में महायुति को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
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इधर शिंदे गुट के पूर्व विधायक सदा सरवणकर के पुत्र समाधान सरवणकर ने अपनी हार को लेकर भाजपा की एक टोली को जिम्मेदार ठहरा कर महायुति में तनाव निर्माण कर दिया है।
तो मिल जाता बहुमत
बीएमसी में भाजपा के 89 नगरसेवक चुने गए हैं, जबकि शिंदे गुट की शिवसेना के 29 पार्षद चुनाव जीते हैं। हालांकि नंबरों के मामले में भाजपा आगे है, लेकिन ये 11 सीटें भाजपा की अकेले सत्ता बनाने की क्षमता पर असर डाल रही हैं। इस वजह से महायुति में नाराजगी उभरने लगी है। सूत्रों के अनुसार अगली योजना तय करने के लिए वरिष्ठ स्तर पर बातचीत शुरू हो गई है।
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भाजपा के दबाव में मनसे ने बदली भूमिका
- ठाकरे बंधुओं में भी माहौल ठीक नहीं है, कल्याण-डोंबिवली में शिंदे गुट को मनसे की ओर से समर्थन दिए जाने को लेकर शिवसेना (ठाकरे गुट) में नाराजगी है।
- ठाकरे गुट के मुखपत्र के रोखठोक में आरोप लगाया गया है कि भाजपा के दबाव में मनसे ने अपनी भूमिका बदली है।
- मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में पैसे का राज हो गया है। भाजपा और शिंदे गुट ने मिलकर चुनावों को गलत लेवल पर पहुंचा दिया है।
- लोकतंत्र जीता नहीं बल्कि चुराया गया है। मनसे नेता राजू पाटिल को भाजपा प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण के दबाव से तंग आकर शिंदे गुट को समर्थन देने पर मजबूर होना पड़ा है।
- ऐसी राजनीति में ‘विकास’ शब्द बदनाम हो गया है। सत्ता के लिए पार्टी बदलने वाले मौकापरस्तों की भी कड़ी आलोचना हो रही है।
