Explainer: 10 साल की कानूनी जंग, रेलवे का विस्तार और विस्थापन का दर्द, बांद्रा गरीब नगर में क्यों चले बुलडोजर?
Bandra East Slum Eviction: बांद्रा गरीब नगर में रेलवे द्वारा चलाए जा रहे अभियान की पूरी सच्चाई। विकास, कानूनी कार्रवाई, मानसून से पहले विस्थापन और मानवीय संकट के बीच उलझे इस मामले का विस्तृत विश्लषण।
- Written By: गोरक्ष पोफली
घरों पर चलते बुलडोजर (सोर्स: सोशल मीडिया)
Bandra Garib Nagar Demolition Explained: मुंबई के बांद्रा पूर्वी रेलवे स्टेशन के पास स्थित गरीब नगर में इन दिनों भारी गहमा-गहमी और तनाव का माहौल है। पश्चिमी रेलवे द्वारा यहाँ एक बड़े पैमाने पर अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य दशकों पुरानी झोपड़पट्टियों को हटाकर रेलवे भूमि को मुक्त कराना है। यह कार्रवाई रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही विस्थापन और पुनर्वास के गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं।
रेलवे का विस्तार और कानूनी आदेश
बांद्रा टर्मिनस के विस्तार और इंटीग्रेटेड रेलवे कॉम्प्लेक्स के निर्माण के लिए पश्चिमी रेलवे को इस जमीन की आवश्यकता है। यह इलाका लंबे समय से कानूनी दांव-पेच का केंद्र रहा है। वर्ष 2017 में रेलवे ने बेदखली की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे निवासियों ने अदालत में चुनौती दी थी। 29 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे को अतिक्रमण हटाने की अनुमति दी। अदालत ने 2021 के सर्वे के आधार पर 100 सुरक्षित झोपड़ियों को छोड़कर बाकी सभी अवैध संरचनाओं को हटाने का आदेश दिया। 6 मई को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के इस आदेश को बरकरार रखा।
अतिक्रमण कार्रवाई का ब्यौरा
रेलवे प्रशासन के अनुसार, यह अभियान पूरी तरह से न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप है। पहले दिन 20% और दूसरे दिन तक 60% कार्य पूरा हुआ और अब 90% कार्य पूरा हो चुका है। अभियान के दूसरे दिन 1,200 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए, जिनमें मुंबई पुलिस, आरपीएफ (RPF) और जीआरपी (GRP) शामिल थे। सात बुलडोजर, छह पोकलेन मशीनें और डंपर का उपयोग किया गया। रेलवे की 5,200 वर्ग मीटर जमीन खाली कराना है, जहाँ से करीब 400 अवैध झोपड़ियाँ हटाई जानी हैं।
सम्बंधित ख़बरें
वर्धा: सेलू तहसील के बोर बांध से नदी में छोड़ा गया पानी, तटीय गांवों के लिए प्रशासन ने जारी किया अलर्ट
वर्धा में 47°C गर्मी से जल संकट गहराया: 11 से एक बड़ा प्रकल्प सूखा, छोटे बांधों में 26% पानी, प्रशासन अलर्ट
नागपुर में साल भर बाद भी ठंडे बस्ते में 10 करोड़ का ‘युद्ध स्मारक’ प्रोजेक्ट, सेना से अंतिम मंजूरी का इंतजार
भाजपा विधायक रवींद्र चव्हाण का फर्जी लेटरहेड बनाकर ठेकेदारों से वसूली की साजिश, जानें कैसे खुला राज
मस्जिद गिराने पर हिंसा और तनाव
दूसरे दिन की कार्रवाई तब हिंसक हो गई जब फैसाने मुस्तफा गरीब नवाज और मस्जिद-ए-इनाम को गिराया गया। निवासियों का दावा है कि ये मस्जिदें 70-80 साल पुरानी थीं। इस कार्रवाई के विरोध में स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच झड़प हुई। पथराव के बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। भाभा अस्पताल और वी.एन. देसाई अस्पताल की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 10 लोग (जिनमें पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी शामिल हैं) घायल हुए हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि पत्थरबाजों को बख्शा नहीं जाएगा। अब तक 16 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और करीब 150 लोगों पर मामला दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है।
विस्थापन का मानवीय पक्ष
जमीन के कानूनी स्वामित्व से इतर, यहाँ रहने वाले परिवारों के लिए यह घर छोड़ना भावनात्मक और आर्थिक संकट है। कई निवासी पिछले 30-40 सालों से यहाँ रह रहे थे। उनका कहना है कि उन्हें विस्थापन के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया और पुनर्वास की स्पष्ट योजना का अभाव है। निवासियों का आरोप है कि उन्हें केवल घरों को खाली करने का नोटिस दिया था। मस्जिदों के तोड़े जाने की कार्रवाई ने तनाव को और बढ़ा दिया। वे खुद को बेसहारा महसूस कर रहे हैं और शहर में उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी सुरक्षित जगह नहीं है।
यह भी पढ़ें: मुंबई में कचरा प्रबंधन के नए नियम लागू, अब चार श्रेणियों में करना होगा कचरे का पृथक्करण
रेलवे प्रशासन का पक्ष
रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, विनीत अभिषेक ने स्पष्ट किया है कि यह कार्रवाई रेल यात्रियों की सुरक्षा और नई रेल लाइन बिछाने की आवश्यकता को ध्यान में रखकर की जा रही है। रेलवे का तर्क है कि 12 अतिरिक्त ट्रेनों के संचालन के लिए यह जमीन खाली कराना आवश्यक है।
जहाँ प्रशासन और कई नागरिक इसे रेलवे सुरक्षा, अवैध निर्माणों को हटाने और इंटीग्रेटेड रेलवे कॉम्प्लेक्स के लिए एक आवश्यक एवं कानूनी कदम मान रहे हैं, वहीं मानसून से ठीक पहले हजारों परिवारों के बेघर होने से गहरा मानवीय संकट उत्पन्न हो गया है। दशकों से यहाँ रह रहे श्रमिक वर्ग के लोग विस्थापन, सामान खोने और उचित पुनर्वास के अभाव के चलते बेसहारा हो गए हैं।
इस कार्रवाई के दौरान हुई हिंसा और मस्जिदों के विध्वंस ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है, जबकि सोशल मीडिया पर लोग इस बात को लेकर बंटे हुए हैं कि कानून का पालन करने की प्रक्रिया में मानवीय संवेदनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए था या नहीं। कुल मिलाकर, यह घटना विकास की गति और शहर की जीवनरेखा माने जाने वाले गरीबों की सुरक्षा के बीच के संघर्ष को उजागर करती है।
