क्या कहता है दल-बदल कानून, क्या सच में शिवसेना UBT के बागी सांसदों के लिए खड़ी होगी कोई बड़ी मुश्किल?
Anti Defection Law Shiv Sena UBT Rebel MP 2026: महाराष्ट्र में शिवसेना UBT सांसदों की बगावत के बाद दलबदल कानून की बारीकियां; क्या सुरक्षित रहेगी 6 सांसदों की सदस्यता?
- Written By: अनिल सिंह
दल बदल कानून से सुरक्षित हैं UBT के बागी सांसद? (प्रतीकात्मक तस्वीर, फोटो सोर्स-AI)
Anti Defection Law Shiv Sena UBT MP: महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) के 6 लोकसभा सांसदों का सीधे उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की ‘शिवसेना’ में विलय का फैसला संवैधानिक और कानूनी रूप से एक बड़ी बहस को जन्म दे चुका है। दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की धाराओं और हालिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक व्याख्याओं के प्रकाश में देखा जाए, तो इन बागी सांसदों का भविष्य काफी हद तक “संख्या बल” और “संवैधानिक बारीकियों” के बीच फंसा हुआ है।
अदालती चौखट और संसद के नियमों के बीच यह समझना बेहद जरूरी है कि देश का कानून इस बारे में क्या कहता है और क्या वाकई इन सांसदों के लिए कोई बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। दो तिहाई सदस्यों का गणित और ट्विन टेस्ट कुछ ऐसे टर्म हैं जो इस मामले में जान लेना बहुत जरूरी है।
10वीं अनुसूची का नियम: 2/3 का गणित और ‘विलय’ की कानूनी अनिवार्यता
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (Tenth Schedule) के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी मूल राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ता है या पार्टी व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द (Disqualify) की जा सकती है। साल 2003 में 91वें संविधान संशोधन के बाद केवल ‘विलय (Merger)’ का ही एक विकल्प बचा है। कानून के मुताबिक, यदि किसी पार्टी के विधायी दल (Legislative Party) के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में अपने दल के विलय का फैसला करते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता। लोकसभा में शिवसेना (UBT) के कुल 9 सांसद थे, जिनमें से 6 बागी सांसदों ने पाला बदला है, जो कि ठीक 2/3 का जादुई आंकड़ा है।
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क्या कहता है कोर्ट का ‘ट्विन टेस्ट’?
भले ही शिवसेना यूबीटी के बागी सांसदों ने 2/3 का आंकड़ा जुटा लिया हो, लेकिन उनके लिए आगे की राह पूरी तरह निष्कंटक नहीं है। कानून के जानकारों और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों (जैसे राजेंद्र सिंह राणा केस) के मुताबिक, 10वीं अनुसूची का पैराग्राफ 4 यह कहता है कि विलय के लिए ‘ट्विन टेस्ट’ (दोहरी शर्त) का पूरा होना जरूरी है। पहली शर्त यह है कि मूल राजनीतिक दल (Original Political Party – यानी संगठन/पार्टी हाईकमान) का किसी दूसरी पार्टी में विलय होना चाहिए और दूसरी शर्त यह कि इस सांगठनिक विलय को सदन के भीतर मौजूद 2/3 सांसदों की मंजूरी मिलनी चाहिए। चूंकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली मूल पार्टी ने विलय का कोई फैसला नहीं किया है, इसलिए यह मामला ‘डीम्ड मर्जर’ के विवाद में फंस सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष का विशेषाधिकार और सुप्रीम कोर्ट की ‘न्यायिक समीक्षा’
दलबदल कानून के तहत किसी भी सांसद की सदस्यता पर अंतिम फैसला लेने का पहला अधिकार लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) का होता है। चूंकि बागी सांसदों ने सीधे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने अपना प्रस्ताव पेश किया है, तकनीकी रूप से यदि अध्यक्ष इस संख्या बल को स्वीकार कर विलय को प्रशासनिक मंजूरी दे देते हैं, तो सांसदों को तत्काल राहत मिल जाएगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के किहोटो होलोहन (1992) फैसले के तहत स्पीकर का फैसला अंतिम नहीं है, उस पर कोर्ट में ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) हो सकती है।
