

Anti Defection TMC MPs Merger: तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने त्रिपुरा की गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI का दामन थाम लिया है। इन सांसदों ने एक सुरक्षित रास्ता अपनाते हुए लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को अपना आधिकारिक पत्र सौंप दिया है। इस चौंकाने वाले कदम के बाद भारतीय राजनीति में दल-बदल विरोधी कानून को लेकर एक नई और बड़ी बहस छिड़ गई है। संविधान और कानून के जानकार इस पूरी प्रक्रिया को गलत बता रहे हैं और इसे सीधा दल-बदल करार दे रहे हैं।
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसदों ने NCPI में अपने विलय का आधिकारिक ऐलान किया है। इसके साथ ही टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने भी अपना अलग गुट बना लिया है और पार्टी में भारी बगावत कर दी है। बागी सांसदों का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष अब संसद में अपने गुट के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की मांग कर रही हैं। यह पूरी कवायद कारोबार में इस्तेमाल होने वाली शेल कंपनियों जैसी लग रही है जो कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए बनाई जाती हैं।
लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल पीडीटी आचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए इस विलय पर बड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि साल 1985 में बने दल-बदल विरोधी कानून के तहत विलय हमेशा राजनीतिक पार्टी का होता है। सिर्फ कुछ सांसदों या विधायकों के दूसरी पार्टी में जाने को कानूनी तौर पर विलय बिल्कुल नहीं माना जा सकता। दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से बचने के लिए मूल राजनीतिक दल का विलय होना सबसे ज्यादा जरूरी है।
टीएमसी के बागी विधायकों के पास 58 का आंकड़ा है जो कानूनी रूप से दो-तिहाई की अहम शर्त पूरी करता है। लेकिन वे किसी दूसरी पार्टी में शामिल नहीं हो रहे हैं क्योंकि संगठन स्तर पर विलय ममता बनर्जी के बिना संभव नहीं है। बागी सांसद और विधायक अलग-अलग रास्तों पर चल रहे हैं जो कानूनी रूप से बेहद कमजोर और पूरी तरह गलत है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी का भी कहना है कि विभाजन या विलय सबसे पहले संसद के बाहर होना चाहिए।
टीएमसी नेतृत्व ने इस बगावत के खिलाफ अपनी कानूनी लड़ाई तेज कर दी है और कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया है। टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के स्पीकर के फैसले को सीधे चुनौती दी है। अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि बागी गुट को कोई मान्यता न दी जाए। टीएमसी सांसद सागरिका घोष और कीर्ति आजाद ने भी 10 जून को यह महत्वपूर्ण पत्र स्पीकर ओम बिरला को सौंप दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुभाष देसाई और राजेंद्र सिंह राणा मामलों में दल-बदल कानून पर स्थिति बिल्कुल साफ की थी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि विधानसभा या संसद के भीतर बैठे विधायक खुद को पार्टी का असली मालिक नहीं समझ सकते। व्हिप जारी करने और अंतिम फैसले लेने का अधिकार मूल राजनीतिक संगठन और उसके अध्यक्ष के पास ही हमेशा होता है। अब देखना होगा कि 2026 के इस सियासी ड्रामे में कानून और स्पीकर का अंतिम फैसला आगे क्या नया मोड़ लेता है।