Mumbai Magistrate Court News: मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने माना है कि गर्भावस्था में बहू को नौकरी छोड़ने की सास की सलाह को क्रूरता नहीं कहा जा सकता है। कोर्ट ने पांच आरोपियों को क्रूरता के आरोप से बरी कर यह फैसला सुनाया है। बहू ने सास पर क्रूरता का आरोप लगाया था।
मुलुंड कोर्ट के जुडिशियल मैजिस्ट्रेट एनजी व्यास ने कहा कि सास ने बहू से कहा था कि वह गर्भावस्था के दौरान यात्रा न करे,इस लिए उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए। इसमें जबरजस्ती और दबाव का भाव नहीं था। सास ने बहू को सिर्फ़ नौकरी छोड़ने की सलाह दी थी।
एफआईआर से यह प्रतीत नहीं होता है कि बच्ची के जन्म के बाद बहू को नौकरी के लिए बाध्य किया गया हो। मैजिस्ट्रेट ने कहा कि अकसर समझ की कमी के कारण सही बात को गलत ढंग से समझा जाता है। परिवार में मामूली कारणों से झगड़ा हो सकता है। कई बार गलतफहमी, भ्रम और बातचीत की कमी के कारण भी झगड़े होते हैं।
झगड़े और विवाद किसी भी पक्ष से हो सकते हैं। बेटी के जन्म के बाद से क्रूरता करने का आरोपबहू के मुताबिक, बेटी को जन्म देने के बाद उससे बुरा बर्ताव किया गया था। महिला ने पति पर मारपीट और अपशब्द कहने का आरोप लगाया था।
उसके रिश्तेदारों पर झगड़े के लिए उकसाने का आरोप था। इसके कारण उसे ससुराल से मायके जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। दस साल पहले दर्ज हुआ था केसकेस से जुड़े दंपती का मई 2010 में विवाह हुआ था।
लंबे समय से जारी झगड़े और बदसलूकी से तंग आकर महिला ने साल 2015 में पुलिस में पति, सास और अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने केस को लेकर आईपीसी की धारा और ए क्रूरता के तहत मामला दर्ज किया था। जिस पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 498ए (क्रूरता) के तहत मामला दर्ज किया था। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और आरोपों की पुष्टि न होने के आधार पर सभी आरोपियों को बरी कर दिया।