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सवाल यह है कि…बंदर के हाथ में माचिस किसने दिया..!
- Written By: नवभारत डेस्क

- मणिपुर से हरियाणा-महाराष्ट्र, दंगे भड़काना, किसकी साजिश…!
देश में पिछले कुछ महीनों से एक अजीब सा भय का माहौल पैदा किया जा रहा है. 90 दिनों से मणिपुर जल रहा है, दो दिन पहले हरियाणा में आग लगाई गई और अब महाराष्ट्र में माहौल बिगाड़ने की साजिश हो रही है. एक अजीब सी समानता है, हर जगह आग लगाने वाले घर के ही ‘चिराग’ है. मणिपुर में तो सीधे तौर पर दशकों से एक साथ रहने वाले दो समुदाय मैती और कुकी के बीच जहर बो दिया गया और अब आग लगाकर हाथ सेंकने का काम किया जा रहा है. हरियाणा में जिस धार्मिक यात्रा को लेकर मेवात के अल्पसंख्यकों के इलाकों में उपद्रव हुआ इसका नेतृत्व विश्व हिन्दू परिषद और दुर्गा वाहिनी द्वारा किया जा रहा था. वहीं अब महाराष्ट्र में पहले तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, फिर प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू का अपमान करने वाले लोग शिवप्रतिष्ठान हिन्दू संस्थान से संबंधित है. इतना सब कुछ सरेआम होने लगा है, हो रहा है, लेकिन देश में कोई भी इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है. देश में पहले कानून के हाथ लंबे होते थे, लेकिन अब वो हाथ भी लंबे नहीं रहे. कानून और व्यवस्था बिगड़ जाने के लिए कोई भी मंत्री-अफसर कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेता. यहां तक कि कोई इस विषय पर चर्चा भी नहीं करना चाहता. यही कारण है कि घर-परिवार के ‘चिराग’ ही घर फूंकने का काम कर रहे हैं. किसके इशारे पर कर रहे हैं, किसको इससे लाभ मिलने वाला है, कौन इसे भड़का रहा है और साजिश कहां रची गई है, यह अधिकांश लोगों को पता है, सिर्फ कोई बोलना नहीं चाह रहा.
ताली एक हाथ से नहीं बजती पर….
कई राजनीतिक दल, कुछ धार्मिक संगठन और चुनिंदा बड़े नेताओं का सबसे प्रिय विषय है धार्मिक द्वेष को बढ़ावा देना. उसके बाद धार्मिक भावनाएं भड़काना और फिर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकना. 80 के दशक के बाद पहले सामाजिक क्रांति की आड़ में शुरू हुई लड़ाई कब धार्मिक अंतर्विरोध में बढ़ गई यह आम आदमी को पता ही नहीं चला. धीरे-धीरे बहुसंख्यकों के दिमाग में यह ठूंसा गया कि कैसे 120 करोड़ से ज्यादा होते हुए भी वे डरपोक हैं, कायर हैं और अल्पसंख्यक उनके साथ दादागिरी करते हैं. 2010 के दशक के बाद तो धार्मिक उन्माद को राजनीति का प्रश्रय मिलने लगा और पहले जो माहौल कुछ राज्यों तक सीमित था वह धीरे-धीरे पूरे देश में होने लगा. पारंपरिक रूप से एक दूसरे से परहेज करने वाली प्रमुख जातियों को उकसाने के लिए सभी धर्मों के ऐसे संगठनों और सिरफिरे लोगों को आगे बढ़ावा दिया गया जो समाज की नहीं, देश की तरक्की के लिए बड़े बाधक है. जब ऐसे असामाजिक तत्व बड़े-भस्मासुर हो जाते हैं तो इनको बढ़ावा देने वाले सत्ताधीश इनसे हाथ झटक देते हैं. तब तक विध्वंस इतना फैल चुका होता है कि उसके जख्म दशकों तक नहीं भरे जा सकते. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा का लोकसभा में दिये गये भाषण का एक अंश जो सोशल मीडिया पर हमेशा ट्रेंडिंग रहता है इस पूरे घटनाक्रम के लिए फिट बैठता है. महुआ ने कहा था कि ‘सवाल यह नहीं है कि जंगल में आग कैसे लगी, सवाल यह है कि बंदर के हाथ में माचिस किसने दिया.’ जैसे कभी ताली एक हाथ से नहीं बजती, वैसे ही झगड़े-फसाद के लिए भी एक व्यक्ति या समाज जिम्मेदार नहीं हो सकता.
कानून के हाथ ‘लंबे’ नहीं रहे, कोर्ट भी सुस्त
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मणिपुर वाले मामले में वहां की पुलिस से पूछा कि घटना के 14 दिन बाद एफआईआर दर्ज करने का कारण क्या था? जब दोनों महिलाओं को नग्न कर घुमाया गया, गैंगरेप किया गया और बाद में हत्या कर दी गई तब पुलिस क्या कर रही थी. इसका जवाब वास्तव में कोई देने को तैयार नहीं है,क्योंकि देश में किसी मंत्री, मुख्यमंत्री, गृहमंत्री को अब जवाब नहीं देना पड़ता. किसी का डर ही नहीं रह गया. जनता का डर तो पूरी तरह खत्म हो गया. क्योंकि जनादेश महत्वहीन हो गया और जनता द्वारा चुनी गई सरकार का कोई औचित्य भी नहीं रहा. कोई यह नहीं दावा कर रहा कि लोकतंत्र खत्म हो गया है, लेकिन अब कोई यह भी दावा नहीं कर सकता कि लोकतंत्र बचा हुआ है. कांवड़ियों की दंगाई साजिश को भांपकर उनके उत्पात को लाठीचार्ज कर रोकने में सफल होने वाले आईपीएस अधिकारी महादेव चौधरी का 4 घंटे बाद ट्रांसफर कर दिया जाता है. कारण सिर्फ एक है कि उन्होंने अपनी ड्यूटी की. मात्र मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह और वहां के डीजीपी को सैकड़ों महिलाओं के साथ बलात्कार, हजारों लोगों के पलायन और असंख्य लूटपाट-आगजनी की घटनाओं के बाद भी पद पर बरकरार रखा जाता है. एक ही सवाल है कौन शह दे रहा है. कौन इन असामाजिक तत्वों की रक्षा कर रहा है. पुलिस अपना काम करने में लगातार विफल होती जा रही है. देश भर में पूरा पुलिस तंत्र कठपुतली बन गया है. अदालतों की आदतें भी अब न्यायदान की कम और ‘सुर्खियों’ में रहने की ज्यादा हो गई है. ईडी के मुखिया को हर हाल में 30 जुलाई को रिटायर करने की सख्त भूमिका रखने वाले सुप्रीम कोर्ट को अचानक ‘देशहित’ में उनका कार्यकाल बढ़ाने का भान आता है. सर्वोच्च अदालत और न्यायाधीश भी जानते हैं, उनको कोई पूछने वाला नहीं है.
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-संजय तिवारी
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