

Maharashtra Foundation Day Special: आज 1 मई है यानी महाराष्ट्र के गौरव का दिन। साल 1960 में जब भाषाई आधार पर बॉम्बे स्टेट से अलग होकर महाराष्ट्र राज्य का उदय हुआ, तब यह एक नए संकल्प की शुरुआत थी। आज 2026 में, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक ऐसा राज्य नजर आता है जिसने न केवल अपनी संस्कृति को सहेजा, बल्कि खुद को भारत का ग्रोथ इंजन बना लिया। आइए जानते है 1960 से 2026 तक पिछले 66 सालों में कितना बदला महाराष्ट्र।
1960 में महाराष्ट्र की जीडीपी का बड़ा हिस्सा खेती से आता था। तब कपड़ा मिलें राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थीं। लेकिन बीते 66 वर्षों में परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। आज महाराष्ट्र भारत की पहली 1 ट्रिलियन इकोनॉमी बनने की राह पर है। मुंबई न केवल भारत की वित्तीय राजधानी है, बल्कि यह ग्लोबल फिनटेक और स्टार्टअप्स का केंद्र बन चुकी है। पुणे आज ऑटोमोबाइल हब और आईटी सिटी के रूप में दुनिया के नक्शे पर है।
1960 के दशक में जहां मुंबई की पहचान उसकी काली-पीली टैक्सी और लोकल ट्रेनों से थी, वहीं 2026 का महाराष्ट्र समृद्धि महामार्ग, अटल सेतु (MTHL) और जाल की तरह फैले मेट्रो नेटवर्क के लिए जाना जाता है। नागपुर, पुणे और नवी मुंबई जैसे शहर अब टियर-2 से बढ़कर ग्लोबल सिटीज को टक्कर दे रहे हैं। कनेक्टिविटी के मामले में महाराष्ट्र ने जो छलांग लगाई है, वह बेमिसाल है।
राज्य ने औद्योगिक विकास में तो झंडे गाड़े, लेकिन कृषि क्षेत्र में तस्वीर मिली-जुली रही। 1960 में पारंपरिक खेती होती थी, आज प्रिसिजन फार्मिंग और एग्री-टेक का जमाना है। राज्य सरकार अब खेती में AI के इस्तेमाल को भी बढ़ावा दे रही है। बावजूद इसके, विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में सिंचाई की कमी और जलवायु परिवर्तन आज भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। जहां एक ओर पुणे के किसान एक्सपोर्ट क्वालिटी के अंगूर उगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सूखे की मार अब भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झकझोर देती है। हम आए दिन महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याओं की खबरें सुनते हैं। बढ़ती महंगाई, मौसम की मार और कर्ज के बोझ तले किसान बेबस है। इसका परिणाम हमें किसान आत्महत्या के रूप में दिखाई पड़ता है। राज्य सरकार हर साल विधानसभा सत्र के दौरान पटल पर मौतें के आंकड़े रखता। यह देख के दुख भी होता है कि जो किसान पूरे मानव जाति के जीवित रहने के अन्न उगा रहा है, वहीं कर्ज को बाेझ से इतना परेशान हो जाता है कि मौत को गले लगा लेता है। सरकारों को इस क्षेत्र अब और अधिक केंद्रीय करके काम करने की जरूरत है।
विकास के इस चमकते पोस्टर के पीछे कुछ धुंधली तस्वीरें भी हैं। मुंबई-पुणे-ठाणे बेल्ट का जितना विकास हुआ, उसकी तुलना में गड़चिरोली या नंदुरबार जैसे आदिवासी और ग्रामीण इलाके आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शहरों की जनसंख्या तो बढ़ी, लेकिन झुग्गी-बस्तियों की समस्या और प्रदूषण 2026 में भी प्रशासन के लिए सिरदर्द बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर जलसंकट भी एक विकराल समस्या है। 'जलयुक्त शिवार' जैसी योजनाओं के बावजूद, मराठवाड़ा के कई जिलों में हर साल टैंकरों से पानी की सप्लाई राज्य की एक कड़वी हकीकत है। हालांकि सरकारें दावा करती आई है कि जल्द ही जलसंकट की समस्या से निजात मिल जाएगी।
हाल ही में महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने सिंचाई क्षेत्र में एक क्रांतिकारी बदलाव की घोषणा की है। राज्य सरकार ने महत्वाकांक्षी वैनगंगा-नलगंगा नदी जोड़ परियोजना को 94,967 करोड़ रुपये की भारी-भरकम प्रशासनिक मंजूरी दे दी है। इस परियोजना से न केवल पश्चिम विदर्भ की प्यास बुझेगी, बल्कि अमरावती समेत छह जिलों की लाखों हेक्टेयर भूमि सिंचिंत होगी।
2026 का महाराष्ट्र अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ग्रीन एनर्जी और सेमीकंडक्टर निर्माण की ओर कदम बढ़ा रहा है। 'मेक इन महाराष्ट्र' अभियान के तहत वैश्विक निवेश राज्य में आ रहा है। महाराष्ट्र दिवस पर आज का संकल्प यही होना चाहिए कि विकास का यह पहिया केवल मुंबई या पुणे तक सीमित न रहे, बल्कि राज्य के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक इसकी पहुंच हो।