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महाराष्ट्र चुनाव: टिकट वितरण में दरकिनार हुई लाड़की बहिन, कांग्रेस की ‘गृहलक्ष्मी’ भी साइडलाइन
- Written By: किर्तेश ढोबले
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में जब आघाड़ी ने अचानक अलग-अलग चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था तब कांग्रेस ने हिंगना विस सीट से कुंदा राऊत को उम्मीदवारी दी थी। हालांकि वे चुनाव हार गई थीं। बीजेपी में पूर्व जिप अध्यक्ष संध्या गोतमारे ने पार्टी से अपील की थी कि जिले में कम से कम एक महिला उम्मीदवार दी जानी चाहिए लेकिन पार्टी ने किसी महिला को उम्मीदवारी नहीं दी।

नागपुर: लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का बिल पास हो चुका है। आजादी के बाद से अब तक हुए लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों का इतिहास देखें तो नागपुर जिले में किसी भी पार्टी ने महिलाओं को राजनीति में आगे आने के लिए उम्मीदवारी देने में उदासीनता ही दिखाई है। कांग्रेस ने जरूर अवसर दिए हैं लेकिन वह भी इक्का-दुक्का। बीजेपी ने तो मौके भी नहीं दिए। आधी आबादी का वोट साधने के लिए चुनावों में उनके लिए लुभावनी योजनाएं व सुरक्षा की गारंटी की घोषणाएं सभी पार्टियों द्वारा की जाती है।
राज्य में तो ऐन विधानसभा चुनाव के मुहाने पर महिलाओं के वोटबैंक को अपनी ओर करने के लिए लाडली बहन योजना शुरू कर उनके बैंक खातों में नगदी जमा किया जा रहा है लेकिन अब तक किसी भी पार्टी ने महिलाओं को कितने प्रतिशत उम्मीदवारी देने वाले हैं, यह घोषणा नहीं की। स्थानीय निकाय स्तर ही नहीं विधानसभा व लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने की काबिल महिला नेत्रियों की कोई कमी नहीं है लेकिन पुरुषों के वर्चस्व वाली राजनीतिक पार्टियां उन्हें अवसर ही नहीं दे रही हैं।
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नागपुर में हाल ही में महिला कांग्रेस द्वारा बदलापुर घटना के विरोध व चुनाव में 33 फीसदी आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग को लेकर आंदोलन हुआ जिसमें मुकुल वासनिक ने प्रदेशाध्यक्ष नाना पटोले से चुनाव लड़ने की इच्छुक महिला कार्यकर्ताओं के निवेदन पर निष्पक्ष विचार करने को कहा है। भाजपा के नेता भी सिर्फ कहते हैं मगर टिकट जब बंटती है तो सूची से महिलाएं नदारद होती हैं। अब तो पार्टियों के लिए लंबे समय से कार्य करने वाली लाडली बहनें प्रतिनिधित्व के लिए उम्मीदवारी भी चाहती हैं।
शुरुआती दौर में मिलता था मौका
देश में चुनावों के शुरुआती दौर में जरूर महिलाओं को अवसर मिला करता था। नागपुर जिले की दो लोकसभा सीटों में नागपुर से कांग्रेस ने 1952 और 1957 में अनसुयाबाई काले को उम्मीदवारी दी थी और वे दोनों बार जीती थीं। 1957 के बाद से अब तक कांग्रेस व भाजपा ने किसी महिला नेत्री को लोस की उम्मीदवारी ही नहीं दी। कांग्रेस का इस सीट पर 12 बार कब्जा रहा लेकिन 10 बार पुरुष उम्मीदवार ही सांसद बने। ऐसा ही हाल जिले की रामटेक सीट का भी है। यह सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। कांग्रेस का ही गढ़ था। वर्ष 1998 में कांग्रेस ने यहां से रानी चित्रलेखा भोंसले को मैदान में उतारा था। वे चुनाव जीती थीं। इसके बाद के चुनाव में यह सीट शिवसेना के कब्जे में चली गई।
इंदिरा की करीबी थीं खापर्डे
कांग्रेस ने उत्तर नागपुर की सरोज खापर्डे को राज्यसभा में जरूर भेजा था। वे इंदिरा गांधी की सबसे करीबी थीं। उन्हें कांग्रेस ने लगातार 5 बार राज्यसभा भेजा। वे 26 वर्ष तक राज्यसभा सदस्य रहीं। 1996 के लोस चुनाव में नागपुर सीट पर कांग्रेस ने बीजेपी के बनवारीलाल पुरोहित के खिलाफ कुंदा विजयकर को उतारा था लेकिन वे हार गई थीं। भाजपा ने नागपुर से किसी महिला नेत्री को राज्यसभा तक नहीं भेजा। अब जब महिलाओं द्वारा 33 फीसदी आरक्षण बिल पास होने के बाद राजनीतिक क्षेत्र में कार्य कर रहीं महिला जनप्रतिनिधियों द्वारा उसे तत्काल लागू करने की मांग उठ रही है तो देखना यह होगा कि लागू होने के पहले विधानसभा चुनाव में पार्टियां उन्हें कितनी हिस्सेदारी देती हैं। आधी आबादी भी सदन में पहुंचकर देश व जनता के लिए कार्य करना चाहती हैं। जिले में तो राजनीतिक पार्टियों द्वारा उन्हें योग्यता होते हुए भी अवसर नहीं दिया जा रहा है।
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सुलेखा ने अपने दम पर जीता था चुनाव
बरिएमं की सुलेखा कुंभारे ने वर्ष 1999 के चुनाव में अपने दम पर कामठी सीट से चुनाव लड़ा और चुनकर आई थीं। उस दौरान भाजपा-शिवसेना युति सरकार बनी जिसे कुंभारे ने समर्थन दिया। उस सरकार में 1999 से 2004 तक वे राज्य मंत्री रहीं। राष्ट्रीय पार्टियों में महिलाओं को नेतृत्व देने के दावे दिखावे के ही रहे हैं। एक कांग्रेस ने 38 वर्ष पूर्व 1985 में उत्तर नागपुर विधानसभा सीट से दमयंति देशभ्रतार को टिकट दी थी। वे चुनाव जीतीं और वन राज्य मंत्री भी बनीं। उसके बाद कांग्रेस ने ही वर्ष 1995 के चुनाव में पश्चिम नागपुर से प्रभावती ओझा को टिकट दिया था लेकिन वे हार गई थीं। 2009 के चुनाव में कामठी सीट से कांग्रेस ने सुनीता गावंडे को बीजेपी के चंद्रशेखर बावनकुले के खिलाफ टिकट दी थी। उन्होंने तब 63 हजार से अधिक वोट हासिल किये थे। फिर महिलाओं को विधानसभा चुनावों में जिले की 12 सीटों में कहीं उम्मीदवारी नहीं दी।
अचानक मिला था मौका
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में जब आघाड़ी ने अचानक अलग-अलग चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था तब कांग्रेस ने हिंगना विस सीट से कुंदा राऊत को उम्मीदवारी दी थी। हालांकि वे चुनाव हार गई थीं। बीजेपी में पूर्व जिप अध्यक्ष संध्या गोतमारे ने पार्टी से अपील की थी कि जिले में कम से कम एक महिला उम्मीदवार दी जानी चाहिए लेकिन पार्टी ने किसी महिला को उम्मीदवारी नहीं दी। जिले में सभी राजनीतिक पार्टियों में सक्रिय व तेजतर्रार महिला पदाधिकारी हैं जो मेयर, जिप अध्यक्ष तक बनीं। ऐसी नेत्रियों को भी पार्टी ने कभी विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारी देने की जरूरत नहीं समझी। इस लोस चुनाव में जिप की पूर्व अध्यक्ष रश्मि बर्वे को कांग्रेस ने रामटेक लोस सीट से उम्मीदवारी दी थी लेकिन उनकी कास्ट वैलिडिटी को मुद्दा बनाया गया और वे चुनाव ही नहीं लड़ पायीं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों में महिलाएं चुनाव लड़ने की इच्छुक हैं। वे सक्षम भी हैं। कांग्रेस, भाजपा, राकां के दोनों गुट सहित शिवसेना में भी चुनाव लड़ने की इच्छुक महिलाओं की सूची लंबी है। आवेदन भी किये गए हैं। देखना होगा कि इन लाडली बहनों की आशाओं पर पार्टियों का क्या निर्णय रहता है।
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